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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Monday, May 12, 2008

तुम धरा सपूत हो - डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी

तुम धरा सपूत हो
-डा महाश्वेता चतुर्वेदी
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तुम धरा सपूत हो
शूर न्याय दूत हो
राह यदि नहीं मिले
पथ नया बना चलो


फूल हों कि शूल हों
राह पर चले चलो
तुम बढ़ो, रुको नहीं
वेग बन चले चलो
राम की शपथ तुम्हें
कृष्ण की शपथ तुम्हें
तुम शिवा प्रताप की
आन से नहीं टलो
लक्ष्य प्रिय महान हो
साथ दिव्य गान हो
संग दीप बुद्धि हो
भूल तुम न मन छलो
स्वप्न को उतार दो
स्वर्ग को निखार दो
लौह रूप धार कर
ताप में नहीं गलो

(प्रस्तुति सहयोग : योगेन्द्र मौदगिल)

3 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

सुंदरतम रचना। बहुत ही सराहनीय कदम।

डॊ. कविता वाचक्नवी said...

प्रभाकर जी,
आपकी सराहना के प्रति कृतज्ञ हूँ.
‘बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति,साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो,व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.
कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए.इसमें महापुरुषों की जीवनियां, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है( जैसे पंचतंत्र,कथा सरित्सागर,हितोपदेश इत्यादि).

यदि आप अथवा आपका कोई परिचित इस अभियान से जुड़ना चाहेंगे तो उन्हें सहयोगी के रूप में मुख्यपृष्ठ पर आदरपूर्वक दर्शाया जाएगा.
धन्यवाद.

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आपका एक-एक सार्थक शब्द इस अभियान व प्रयास को बल देगा. मर्यादा व संतुलन, विवेक के पर्याय हैं और उनकी सराहना के शब्द मेरे पास नहीं हैं;पुनरपि उनका सत्कार करती हूँ|आपके प्रतिक्रिया करने के प्रति आभार व्यक्त करना मेरा नैतिक दायित्व ही नहीं अपितु प्रसन्नता का कारण भी है|पुन: स्वागत कर हर्ष होगा| आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।

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