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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Friday, November 21, 2008

पंगारा का क्या कहना !



सुगंध बिखेरती, मन लुभावनी शाम को उद्यान के आसपास या गाँव की गलियों में जब आप चहल-कदमी करने निकलें, तो पंगारा के लाल रंग के फूलों की जीवंत आभा आपको मंत्रमुग्ध कर लेगी। पंगारा में जब फूल खिलते हैं, तब एक आकर्षक दृश्य निर्मित हो जाता है। गुच्छों में लगे गहरे लाल रंग के फूलों के कारण ही इसका नाम पंगारा पड़ा है।


पंगारा को वनस्पति शास्त्र में एरिथरिना बैअरिगेट या इंडिका कहा जाता है, जो एक ग्रीक शब्द इरूथ्रोस से आया है। जिसका अर्थ लाल होता है और फूलों के लाल रंग की ओर संकेत करता है। वास्तव में पंगारा भारतीय वृक्ष है, जो भारत के तटीय और भीतरी पतझड़ी जंगलों में अंडमान-निकोबार से लेकर म्यांमार और जावा तक में पाया जाता है।


पंगारा की छाल चिकनी और भूरी होती है। इसमें जगह-जगह धब्बे पाये जाते हैं। तने और शाखाओं पर तीखे, पैने कांटे होते हैं, जो पेड़ की आयु जैसे-जैसे बढ़ती है, वैसे-वैसे समाप्त होते जाते हैं। इन कांटों से छोटे पंगारा का, पक्षी और अन्य कीटों से बचाव होता है। इसकी जड़ें उथली होती हैं। लकड़ी नरम और भुरभुरी व नाज़ुक होती है। पत्तियां बड़ा तिकोन लिए होती हैं, जो सामान्यत 4-6 इंच चौड़ी होती हैं और मध्य का भाग बड़ा होता है। पत्तियाँ चमकीले हरे रंग की होती हैं और ठण्ड के मौसम में गिर जाती हैं। मार्च-अप्रैल तक वृक्ष पत्तों के बगैर रहता है। कम आयु वाले पंगारा में पत्तियाँ वर्षभर रहती हैं।


चमकीले लाल रंग के फूल जनवरी की शुरूआत में आना शुरू हो जाते हैं और यह क्रम मार्च-अप्रैल तक जारी रहता है। फूल छोटी-छोटी बालियों में लगते हैं, जो एकल होते हैं या छोटी-छोटी शाखाओं के अंतिम हिस्सों पर अन्यों के साथ संलग्न होते हैं। फूल 2 से 2.5 इंच लंबी फलियों के आकार वाले बड़े, सघन गुच्छों में लगे होते हैं। ये गुच्छे 4 से 12 इंच लंबे और 5 इंच के घेरे में फैले होते हैं। जिन शाखाओं में फूल लगे होते हैं, उनका अंतिम हिस्सा टार्च या धधकती मशाल-सा प्रतीत होता है।


फूलों में पाँच पंखुड़ियाँ होती हैं। इनमें से एक पंखुड़ी अन्य पंखुड़ियों से बड़ी होती है। यह सीधी, लंबी और नुकीली होती है और आधार पर संकरी होती है। दो पंखुड़ियाँ छोटे पंखों के समान होती हैं, जबकि शेष समान आकार की होती हैं। इनका रंग किरमिजी लाल होता है। ये चार पंखुड़ियां मुख्य पंखुड़ी की आधार परतों के साथ जुड़ी होती हैं। फूलों में सुगंध नहीं होती है, किन्तु पक्षियों के लिए ये आकर्षण का केन्द्र बने रहते हैं।


वास्तव में तथ्य तो यह है कि पंगारा जब पूर्ण रूप से खिला होता है, तो वहाँ तरह-तरह के पक्षियों का मेला-सा लग लग जाता है, कौए, मैना, सात भाई, तोते, रोजी पैस्टर, इसी तरह असंख्य मधुमक्खियाँ और ततैया को इसका परागण बहुत पसंद होने के कारण इसके फूल उत्पादक बन जाते हैं। फूलों के आने के बाद जल्दी ही बीज के लिए फलियाँ आना शुरू हो जाती हैं। पहले ये फलियाँ हरी होती हैं और बाद में काली हो जाती हैं। इनकी लंबाई 15 से 30 सेन्टीमीटर तक होती है, जिसमें एक दर्जन के करीब भूरे-लाल या किरमिजी रंग के अंडाकार चिकने बीज पाए जाते हैं। ये मई और जून में पक जाते हैं।


जंगलों में रहने वाले लोगों ने इसे अपने लाभ के लिए उपयोग में लाना शुरू कर दिया है। पशुओं और अन्य प्राणियों से फसल की रक्षा के लिए बाड़ के रूप में खेत के चारों ओर इसे रोप दिया जाता है। पंगारा का इसके अलावा और भी कई तरह से उपयोग किया जाता है। इसे तटीय नगरों में सड़क के किनारे और बगीचे के चारों और बाड़ तैयार करने के लिए लगाया जाता है। यह काली मिर्च और अंगूर की लताओं के लिए सहारे का भी काम करता है।


कार्य में इसकी योग्यता का मुख्य कारण यह है कि यह बहुत तेज गति से बढ़ता है और इसकी छाल भी उपयुक्त होती है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि गर्मी के महीनों में इसकी सघन पत्तियां, लताओं को सघन छाया प्रदान करती हैं और उनके लिए आवश्यक नमी बनाए रखती हैं। जैसे-जैसे दिन ठण्डे होने लगते हैं, वैसे-वैसे इसकी पत्तियां झड़ने लगती हैं और लता को आवश्यकतानुसार सूर्य-प्रकाश मिलने लगता है। पंगारा के बीज जहरीले होते हैं, किन्तु छाल, पत्तियां और उनका अर्क औषधीय गुणवत्ता लिए होता है। इसके गहरे लाल रंग के फूल हवाना के लोगों में फैशन के लिए बहुत अधिक प्रसिद्ध हैं |

(मिलाप)

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Wednesday, November 19, 2008

विदुषी वृजरानी - मुंशी प्रेमचंद

विदुषी वृजरानी
- मुंशी प्रेमचंद


जब से मुंशी संजीवनलाल तीर्थ यात्रा को निकले और प्रतापचन्द्र प्रयाग चला गया उस समय से सुवामा के जीवन मेंबड़ा अन्तर हो गया था। वह ठेके के कार्य को उन्नत करने लगी। मुंशी संजीवनलाल के समय में भी व्यापार मेंइतनी उन्नति नहीं हुई थी। सुवामा रात-रात भर बैठी ईंट-पत्थरों से माथा लड़ाया करती और गारे-चूने की चिंता मेंव्याकुल रहती। पाई-पाई का हिसाब समझती और कभी-कभी स्वयं कुलियों के कार्य की देखभाल करती। इन कार्योंमें उसकी ऐसी प्रवृति हुई कि दान और व्रत से भी वह पहले का-सा प्रेम रहा। प्रतिदिन आय वृद्वि होने पर भीसुवामा ने व्यय किसी प्रकार का बढ़ाया। कौड़ी-कौड़ी दाँतो से पकड़ती और यह सब इसलिए कि प्रतापचन्द्रधनवान हो जाए और अपने जीवन-पर्यन्त सानंद रहे।

सुवामा को अपने होनहार पुत्र पर अभिमान था। उसके जीवन की गति देखकर उसे विश्वास हो गया था कि मन मेंजो अभिलाषा रखकर मैंने पुत्र माँगा था, वह अवश्य पूर्ण होगी। वह कालेज के प्रिंसिपल और प्रोफेसरों से प्रताप कासमाचार गुप्त रीति से लिया करती थी और उनकी सूचनाओं का अध्ययन उसके लिए एक रसेचक कहानी के तुल्यथा। ऐसी दशा में प्रयाग से प्रतापचन्द्र को लोप हो जाने का तार पहुँचा मानों उसके हुदय पर वज्र का गिरना था।सुवामा एक ठण्डी साँसे ले, मस्तक पर हाथ रख बैठ गयी। तीसरे दिन प्रतापचन्द्र की पुस्तकें, कपड़े और सामग्रियाँभी पहुँची, यह घाव पर नमक का छिड़काव था।

प्रेमवती के मरे का समाचार पाते ही प्राणनाथ पटना से और राधाचरण नैनीताल से चले। उसके जीते-जी आते तोभेंट हो जाती, मरने पर आये तो उसके शव को भी देखने को सौभाग्य हुआ। मृतक-संस्कार बड़ी धूम से कियागया। दो सप्ताह गाँव में बड़ी धूम-धाम रही। तत्पश्चात् मुरादाबाद चले गये और प्राणनाथ ने पटना जाने की तैयारीप्रारम्भ कर दी। उनकी इच्छा थी कि स्त्री को प्रयाग पहुँचाते हुए पटना जाएँ पर सेवती ने हठ किया कि जब यहाँतक आये हैं, तो विरजन के पास भी अवश्य चलना चाहिए नहीं तो उसे बड़ा दु: होगा। समझेगी कि मुझे असहायजानकर इन लोगों ने भी त्याग दिया।

सेवती का इस उचाट भवन मे आना मानो पुष्पों में सुगन्ध में आना था। सप्ताह भर के लिए सुदिन का शुभागमन होगया। विरजन बहुत प्रसन्न हुई और खूब रोयी। माधवी ने मुन्नू को अंक में लेकर बहुत प्यार किया।


प्रेमवती के चले जाने पर विरजन उस गृह में अकेली रह गई थी। केवल माधवी उसके पास थी। हृदय-ताप औरमानसिक दु: ने उसका वह गुण प्रकट कर दिया, जो अब तक गुप्त था। वह काव्य और पद्य-रचना का अभ्यासकरने लगी। कविता सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएँ चाहे वे दु: हों या सुख की, उसी समयसम्पन्न होती हैं जब हम दु: या सुख का अनुभव करते हैं। विरजन इन दिनों रात-रात बैठी भाषा में अपनेमनोभावों के मोतियों की माला गूँथा करती। उसका एक-एक शब्द करुणा और वैराग्य से परिपूर्ण होता था| अन्यकवियों के मनों में मित्रों की वाह -वाह और काव्य-प्रेमियों के साधुवाद से उत्साह पैदा होता है, पर विरजन अपनीदु: कथा अपने ही मन को सुनाती थी।


सेवती को आये दो- तीन दिन बीते थे। एक दिन विरजन से कहा- मैं तुम्हें बहुधा किसी ध्यान में मग्न देखती हूँऔर कुछ लिखते भी पाती हूँ। मुझे बताओगी? विरजन लज्जित हो गयी। बहाना करने लगी कि कुछ नहीं, यों हीजी कुछ उदास रहता है। सेवती ने कहा-मैं मानूँगी। फिर वह विरजन का बाक्स उठा लायी, जिसमें कविता केदिव्य मोती रखे हुए थे। विवश होकर विरजन ने अपने नय पद्य सुनाने शुरु किये। मुख से प्रथम पद्य का निकलनाथा कि सेवती के रोएँ खड़े हो गये और जब तक सारा पद्य समाप्त हुआ, वह तन्मय होकर सुनती रही। प्राणनाथकी संगति ने उसे काव्य का रसिक बना दिया था। बार-बार उसके नेत्र भर आते। जब विरजन चुप हो गयी तो एकसमाँ बँधा हुआ था मानों को कोई मनोहर राग अभी थम गया है। सेवती ने विरजन को कण्ठ से लिपटा लिया, फिरउसे छोड़कर दौड़ी हुई प्राणनाथ के पास गयी, जैसे कोई नया बच्चा नया खिलौना पाकर हर्ष से दौड़ता हुआ अपनेसाथियों को दिखाने जाता है। प्राणनाथ अपने अफसर को प्रार्थना-पत्र लिख रहे थे कि मेरी माता अति पीड़िता होगयी है, अतएव सेवा में प्रस्तुत होने में विलम्ब हुआ। आशा करता हूँ कि एक सप्ताह का आकस्मिक अवकाश प्रदानकिया जायगा। सेवती को देखकर चट अपना प्रार्थना -पत्र छिपा लिया और मुस्कराये। मनुष्य कैसा धूर्त है! वहअपने आपको भी धोखा देने से नहीं चूकता।

सेवती- तनिक भीतर चलो, तुम्हें विरजन की कविता सुनवाऊँ, फड़क उठोगे।

प्राण0- अच्छा, अब उन्हें कविता की चाट हुई है? उनकी भाभी तो गाया करती थीतुम तो श्याम बड़े बेखबर हो।
सेवती- तनिक चलकर सुनो, तो पीछे हँसना मुझे तो उसकी कविता पर आश्चर्य हो रहा है।
प्राण0- चलो, एक पत्र लिखकर अभी आता हूँ।
सेवती- अब यही मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं आपके पत्र नोच डालूँगी

सेवती प्राणनाथ को घसीट ले आयी। वे अभी तक यही जानते थे कि विरजन ने कोई सामान्य भजन बनाया होगा।उसी को सुनाने के लिए व्याकुल हो रही होगी। पर जब भीतर आकर बैठे और विरजन ने लजाते हुए अपनी भावपूर्णकविताप्रेम की मतवालीपढ़नी आरम्भ की तो महाशय के नेत्र खुल गये। पद्य क्या था, हृदय के दुख की एक धाराऔर प्रेमरहस्य की एक कथा थी। वह सुनते थे और मुग्ध होकर झुमते थे। शब्दों की एक-एक योजना पर, भावोंके एक-एक उदगार पर लहालोट हुए जाते थे। उन्होंने बहुतेरे कवियों के काव्य देखे थे, पर यह उच्च विचार, यहनूतनता, यह भावोत्कर्ष कहीं दीख पड़ा था। वह समय चित्रित हो रहा था जब अरुणोदय के पूर्व मलयानिललहराता हुआ चलता है, कलियाँ विकसित होती हैं, फूल महकते हैं और आकाश पर हल्की लालिमा छा जाती है।एकएक शब्द में नवविकसित पुष्पों की शोभा और हिमकिरणों की शीतलता विद्यमान थी। उस पर विरजन कासुरीलापन और ध्वनि की मधुरता सोने में सुगन्ध थी। ये छन्द थे, जिन पर विरजन ने हृदय को दीपक की भॉँतिजलाया था। प्राणनाथ प्रहसन के उद्देश्य से आये थे। पर जब वे उठे तो वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता था, मानो छाती सेहृदय निकल गया है। एक दिन उन्होंने विरजन से कहा- यदि तुम्हारी कविताएँ छपें , तो उनका बहुत आदर हो।

विरजन ने सिर नीचा करके कहा- मुझे विश्वास नहीं कि कोई इनको पसन्द करेगा।

प्राणनाथ- ऐसा संभव ही नहीं। यदि हृदयों में कुछ भी रसिकता है तो तुम्हारे काव्य की अवश्य प्रतिष्ठा होगी। यदिऐसे लोग विद्यमान हैं, जो पुष्पों की सुगन्ध से आनन्दित हो जाते हैं, जो पक्षियों के कलरव और चाँदनी कीमनोहारिणी छटा का आनन्द उठा सकते हैं, तो वे तुम्हारी कविता को अवश्य हृदय में स्थान देंगे। विरजन के ह्दयमे वह गुदगुदी उत्पन्न हुई जो प्रत्येक कवि को अपने काव्यचिन्तन की प्रशंसा मिलने पर, कविता के मुद्रित होनेके विचार से होती है। यद्यपि वह नहींनहीं करती रही, पर वह, ‘नहीं’, ‘हाँके समान थी। प्रयाग से उन दिनोंकमलानाम की अच्छी पत्रिका निकलती थी। प्राणनाथ नेप्रेम की मतवालीको वहाँ भेज दिया। सम्पादक एककाव्यरसिक महानुभाव थे कविता पर हार्दिक धन्यवाद दिया और जब यह कविता प्रकाशित हुई,तोसाहित्यसंसार में धूम मच गयी। कदाचित ही किसी कवि को प्रथम ही बार ऐसी ख्याति मिली हो। लोग पढ़ते औरविस्मय से एक-दूसरे का मुँह ताकते थे। काव्यप्रेमियों मे कई सप्ताह तक मतवाली बाला के चर्चे रहे। किसी कोविश्वास ही आता था कि यह एक नवजात कवि की रचना है। अब प्रति मासकमलाके पृष्ठ विरजन की कवितासे सुशोभित होने लगे औरभारत महिलाको लोकमत ने कवियों के सम्मानित पद पर पहुँचा दिया भारतमहिलाका नाम बच्चे-बच्चे की जिह्वा पर चढ गया। कोई इस समाचार-पत्र या पत्रिकाभारत महिलाको ढूढनेलगते। हां, उसकी दिव्य शक्तियाँ अब किसी को विस्मय में डालतीं उसने स्वयं कविता का आदर्श उच्च कर दियाथा।

तीन वर्ष तक किसी को कुछ भी पता लगा किभारत महिलाकौन है। निदान प्राण नाथ से रहा गया। उन्हेंविरजन पर भक्ति हो गयी थी। वे कई मास से उसका जीवनचरित्र लिखने की धुन में थे। सेवती के द्वारा धीरे-धीरेउन्होनें उसका सब जीवन चरित्र ज्ञात कर दिया औरभारत महिलाके शीर्षक से एक प्रभावपूरित लेख लिया।प्राणनाथ ने पहिले लेख लिखा था, परन्तु श्रद्वा ने अभ्यास की कमी पूरी कर दी थी। लेख अत्यन्त रोचक, समालोचनात्मक और भावपूर्ण था।

इस लेख का मुद्रित होना था कि विरजन को चारों तरफ से प्रतिष्ठा के उपहार मिलने लगे। राधाचरण मुरादाबाद सेउसकी भेंट को आये। कमला, उमादेवी, कुंवर और सखिया जिन्होने उसे विस्मरण कर दिया था प्रतिदिन विरजनके दशर्नों को आने लगी। बडे बडे गणमान्य सज्जन जो ममता के अभिमान से हकीमों के सम्मुख सिर झुकाते, विरजन के द्वार पर दशर्न को आते थे। चन्द्रा स्वयं तो सकी, परन्तु पत्र में लिखा – `जी चाहता है कि तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर घंटों रोऊँ'|



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Friday, November 14, 2008

बच्चे काम पर जा रहे हैं - राजेश जोशी


बच्चे काम पर जा रहे हैं


- राजेश जोशी


कोहरे से ढँकी सड़क पर
सुबह सुबह
बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह
काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे?
क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें
क्या सारे मैदान, सारे बगीचे और घरों के आँगन
खत्म हो गए हैं एकाएक
तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज्यादा यह
कि हैं सारी चीजें हस्बमामूल
पर दुनिया की हजारों सड़कों से गुजरते हुए
बच्चे, बहुत छोटे छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।




Friday, November 7, 2008

ईर्ष्या

ईर्ष्या
- मुंशी प्रेमचंद



प्रतापचन्द्र ने विरजन के घर आना-जाना विवाह के कुछ दिन पूर्व से ही त्याग दिया था। वह विवाह के किसी भीकार्य में सम्मिलित नहीं हुआ। यहाँ तक कि महफिल में भी गया। मलिन मन किये, मुँह लटकाये, अपने घर बैठारहा, मुंशी संजीवनलाला, सुशीला, सुवामा सब बिनती करके हार गये, पर उसने बारात की ओर दृष्टि फेरी। अंतमें मुंशीजी का मन टूट गया और फिर कुछ बोले। यह दशा विवाह के होने तक थी। विवाह के पश्चात तो उसनेइधर का मार्ग ही त्याग दिया। स्कूल जाता तो इस प्रकार एक ओर से निकल जाता, मानों आगे कोई बाघ बैठा हुआहै, या जैसे महाजन से कोई ऋणी मनुष्य आँख बचाकर निकल जाता है। विरजन की तो परछाई से भागता। यदिकभी उसे अपने घर में देख पाता तो भीतर पग देता। माता समझाती- बेटा! विरजन से बोलते-चालते क्यों नहीं ? क्यों उससे मन मोटा किये हुए हो ? वह -आकर घण्टों रोती है कि मैने क्या किया है जिससे वह रुष्ट हो गया है।देखो , तुम और वह कितने दिनों तक एक संग रहे हो। तुम उसे कितना प्यार करते थे। अकस्मात् तुमको क्या होगया? यदि तुम ऐसे ही रूठे रहोगे तो बेचारी लड़की की जान पर बन जायेगी। सूखकर काँटा हो गयी है। ईश्वर हीजानता है, मुझे उसे देखकर करुणा उत्पन्न होती है। तुम्हारी चर्चा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती।


प्रताप आँखें किये हुए सब सुनता और चुपचाप सरक जाता। प्रताप अब भोला बालक नहीं था। उसके जीवनरूपीवृक्ष में यौवनरूपी कोपलें फूट रही थी। उसने बहुत दिनों से-उसी समय से जब से उसने होश संभाला-विरजन केजीवन को अपने जीवन में शर्करा में क्षीर की भॉति मिला लिया था। उन मनोहर और सुहावने स्वप्नों का इसकठोरता और निर्दयता से धूल में मिलाया जाना उसके कोमल हृदय को विदीर्ण करने के लिए काफी था, वह जोअपने विचारों में विरजन को अपना सर्वस्व समझता था, कहीं का रहा, और वह, जिसने विरजन को एक पल केलिए भी अपने ध्यान में स्थान दिया था, उसका सर्वस्व हो गया। इस विर्तक से उसके हृदय में व्याकुलता उत्पन्नहोती थी और जी चाहता था कि जिन लोगों ने मेरी स्वप्नवत् भावनाओं का नाश किया है और मेरे जीवन कीआशाओं को मिटटी में मिलाया है, उन्हें मैं भी जलाऊँ सबसे अधिक क्रोध उसे जिस पर आता था वह बेचारीसुशीला थी।


शनै:-शनै: उसकी यह दशा हो गई कि जब स्कूल से आता तो कमलाचरण के सम्बन्ध की कोई घटना अवश्य वर्णनकरता। विशेष कर उस समय जब सुशीला भी बैठी रहती। उस बेचारी का मन दुखाने में इसे बडा ही आनन्द आता।यद्यपि अव्यक्त रीति से उसका कथन और वाक्य-गति ऐसी हृदय-भेदिनी होती थी कि सुशीला के कलेजे में तीर कीभाँति लगती थी। आज महाशय कमलाचरण तिपाई के ऊपर खड़े थे, मस्तक गगन का स्पर्श करता था। परन्तुनिर्लज्ज इतने बड़े कि जब मैंने उनकी ओर संकेत किया तो खड़े-खड़े हँसने लगे आज बडा तमाशा हुआ। कमलाने एक लड़के की घड़ी उड़ा दी। उसने मास्टर से शिकायत की। उसके समीप वे ही महाशय बैठे हुए थे। मास्टर नेखोज की तो आप ही फेंटे से घडी मिली। फिर क्या था ? बडे मास्टर के यहाँ रिपोर्ट हुई। वह सुनते ही झ्ल्ला गये औरकोई तीन दर्जन बेंतें लगायीं, सड़ासड़। सारा स्कूल यह कौतूहल देख रहा था। जब तक बेंतें पड़ा की, महाशयचिल्लाया किये, परन्तु बाहर निकलते ही खिलखिलाने लगे और मूँछों पर ताव देने लगे। चाची। नहीं सुना ? आजलडको ने ठीक सकूल के फाटक पर कमलाचरण को पीटा। मारते-मारते बेसुध कर दिया। सुशीला ये बातें सुनतीऔर सुन-सुसनकर कुढती। हाँ, प्रताप ऐसी कोई बात विरजन के सामने करता। यदि वह घर में बैठी भी होती तोजब तक चली जाती, यह चर्चा छेडता। वह चाहता था कि मेरी बात से इसे कुछ दुख: हो।


समय-समय पर मुंशी संजीवनलाल ने भी कई बार प्रताप की कथाओं की पुष्टि की। कभी कमला हाट में बुलबुललड़ाते मिल जाता, कभी गुण्डों के संग सिगरेट पीते, पान चबाते, बेढंगेपन से घूमता हुआ दिखायी देता। मुंशीजीजब जामाता की यह दशा देखते तो घर आते ही स्त्री पर क्रोध निकालते- यह सब तुम्हारी ही करतूत है। तुम्ही नेकहा था घर-वर दोनों अच्छे हैं, तुम्हीं रीझी हुई थीं। उन्हें उस क्षण यह विचार होता कि जो दोषारोपण सुशील परहै, कम-से-कम मुझ पर ही उतना ही है। वह बेचारी तो घर में बन्द रहती थी, उसे क्या ज्ञात था कि लडका कैसा है।वह सामुद्रिक विद्या थोड़े ही पढी थी ? उसके माता-पिता को सभ्य देखा, उनकी कुलीनता और वैभव पर सहमत होगयी। पर मुंशीजी ने तो अकर्मण्यता और आलस्य के कारण छान-बीन की, यद्यपि उन्हें इसके अनेक अवसरप्राप्त थे, और मुंशीजी के अगणित बाँधव इसी भारतवर्ष में अब भी विद्यमान हैं जो अपनी प्यारी कन्याओं को इसीप्रकार नेत्र बन्द करके कुएँ में ढकेल दिया करते हैं।


सुशीला के लिए विरजन से प्रिय जगत् में अन्य वस्तु थी। विरजन उसका प्राण थी, विरजन उसका धर्म थी औरविरजन ही उसका सत्य थी। वही उसकी प्राणाधार थी, वही उसके नयनों की ज्योति और हृदय का उत्साह थी, उसकी सर्वौच्च सांसारिक अभिलाषा यह थी कि मेरी प्यारी विरजन अच्छे घर जाए। उसके सास-ससुर, देवी-देवताहों। उसके पति शिष्टता की मूर्ति और श्रीरामचंद्र की भांति सुशील हों। उस पर कष्ट की छाया भी पडे। उसनेमर-मरकर बड़ी मिन्नतों से यह पुत्री पायी थी और उसकी इच्छा थी कि इन रसीले नयनों वाली, अपनी भोली-भालीबाला को अपने मरण-पर्यन्त आंखों से अदृश्य होने दूँगी। अपने जामाता को भी यहीं बुलाकर अपने घर रखूँगी।जामाता मुझे माता कहेगा, मैं उसे लड़का समझूँगी। जिस हृदय में ऐसे मनोरथ हों, उस पर ऐसी दारुण औरहृदयविदारणी बातों का जो कुछ प्रभाव पड़ेगा, प्रकट है।


हा! हन्त! दीना सुशीला के सारे मनोरथ मिट्टी में मिल गये। उसकी सारी आशाओं पर ओस पड़ गयी। क्या सोचतीथी और क्या हो गया। अपने मन को बार-बार समझाती कि अभी क्या है, जब कमला सयानी हो जाएगी तो सबबुराइयाँ स्वयं त्याग देगा पर एक निन्दा का घाव भरने नहीं पाता था कि फिर कोई नवीन घटना सुनने में जाती। इसी प्रकार आघात-पर-आघात पडते गये। हाय! नहीं मालूम विरजन के भाग्य में क्या बदा है ? क्या यहगुण की मूर्ति, मेरे घर की दीप्ति, मेरे शरीर का प्राण इसी दुष्कृत मनुष्य के संग जीवन व्यतीत करेगी ? क्या मेरीश्यामा इसी गिद्ध के पाले पड़ेगी ? यह सोचकर सुशीला रोने लगती और घंटों रोती रहती है। पहिले विरजन कोकभी-कभी डांट - डपट भी दिया करती थी, अब भूलकर भी कोई बात कहती। उसका मुँह देखते ही उसे याद जाती। एक क्षण के लिए भा उसे सामने से अदृश्य होने देगी। यदि जरा देर के लिए वह सुवामा के घर चली जाती, तो स्वयं पहुँच जाती उसे ऐसा प्रतीत होता मानों कोई उसे छीनकर ले भागता है। जिस प्रकार वधिक की छुरी केतले अपने बछड़े को देखकर गाय का रोम-रोम काँपने लगता है, उसी प्रकार विरजन के दुख का ध्यान करकेसुशीला की आँखों में संसार सूना जाना पड़ता था। इन दिनों विरजन को पल-भर के लिए नेत्रों से दूर करते उसे वहकष्ट और व्याकुलता होती,जो चिड़िया को घोंसले से बच्चे के खो जाने पर होती है।


सुशीला एक तो यों ही जीर्ण रोगिणी थी। उस पर
भविष्य की असाध्य चिन्ता और जलन ने उसे और भी घुला डाला।निन्दाओं ने कलेजा छलनी कर दिया। : मास भी बीतने पाये थे कि क्षयरोग के चिह्न दिखायी दिए। प्रथम तोकुछ दिनों तक साहस करके अपने दु: को छिपाती रही, परन्तु कब तक ? रोग बढने लगा और वह शक्तिहीन होगयी। चारपाई से उठना कठिन हो गया। वैद्य और डाक्टर औषधि करने लगे। विरजन और सुवामा दोनों रात-दिनउसके पांस बैठी रहतीं विरजन एक पल के लिए उसकी दृष्टि से ओझल होती। उसे अपने निकट देखकरसुशीला बेसुध-सी हो जाती और फूट-फूटकर रोने लगती। मुंशी संजीवनलाल पहले तो धैर्य के साथ दवा करते रहे, पर जब देखा कि किसी उपाय से कुछ लाभ नहीं होता और बीमारी की दशा दिन-दिन निकृष्ट होती जाती है तो अंतमें उन्होंने भी निराश हो उद्योग और साहस कम कर दिया। आज से कई साल पहले जब सुवामा बीमार पड़ी थी तबसुशीला ने उसकी सेवा-शुश्रूषा में पूर्ण परिश्रम किया था,अब सुवामा की बारी आयी। उसने पड़ोसी और भगिनी केधर्म का पालन भली-भांति किया। रुग्ण-सेवा में अपने गृहकार्य को भूल-सी गई। दो-दो तीन-तीन दिन तक प्रतापसे बोलने की नौबत आती बहुधा वह बिना भोजन किये ही स्कूल चला जाता। परन्तु कभी कोई अप्रिय शब्दमुख से निकालता। सुशीला की रुग्णावस्था ने अब उसकी द्वेषाग्नि को बहुत कम कर दिया था। द्वेष की अग्निद्वेष्टा की उन्नति और दुर्दशा के साथ-साथ तीव्र और प्रज्जवलित हो जाती है और उसी समय शान्त होती है जब द्वेष्टाके जीवन का दीपक बुझ जाता है।


जिस दिन वृजरानी को ज्ञात हो जाता कि आज प्रताप बिना भोजन किये स्कूल जा रहा है, उस दिन वह कामछोड़कर उसके घर दौड़ जाती और भोजन करने के लिए आग्रह करती, पर प्रताप उससे बात करता, उसे रोताछोड़ बाहर चला जाता। निस्संसदेह वह विरजन को पूर्णत: निर्दोष समझता था, परन्तु एक ऐसे संबध को, जो वर्ष: मास में टूट जाने वाला हो, वह पहले ही से तोड़ देना चाहता था। एकान्त में बैठकर वह आप-ही-आपफूट-फूटकर रोता, परन्तु प्रेम के उद्वेग को अधिकार से बाहर होने देता।


एक दिन वह स्कूल से आकर अपने कमरे में बैठा हुआ था कि विरजन आयी। उसके कपोल अश्रु से भीगे हुए थे औरवह लंबी-लंबी सिसकियाँ ले रही थी। उसके मुख पर इस समय कुछ ऐसी निराशा छाई हुई थी और उसकी दृष्टि कुछऐसी करुणोत्पादक थी कि प्रताप से रहा गया। सजल नयन होकर बोला-‘क्यों विरजन। रो क्यों रही हो ? विरजनने कुछ उतर दिया, वरन और बिलख-बिलखकर रोने लगी। प्रताप का गाम्भीर्य जाता रहा। वह निस्संकोच होकरउठा और विरजन की आँखों से आँसू पोंछने लगा। विरजन ने स्वर संभालकर कहा- लल्लू अब माताजी जीयेंगी, मैं क्या करुँ ? यह कहते-कहते फिर सिसकियाँ उभरने लगी।


प्रताप यह समाचार सुनकर स्तब्ध हो गया। दौड़ा हुआ विरजन के घर गया और सुशीला की चारपाई के समीप खड़ाहोकर रोने लगा। हमारा अन्त समय कैसा धन्य होता है। वह हमारे पास ऐसे-ऐसे अहितकारियों को खींच लाता है, जो कुछ दिन पूर्व हमारा मुख नहीं देखना चाहते थे, और जिन्हें इस शक्ति के अतिरिक्त संसार की कोई अन्य शक्तिपराजित कर सकती थी। हाँ यह समय ऐसा ही बलवान है और बडे-बडे बलवान शत्रुओं को हमारे अधीन कर देताहै। जिन पर हम कभी विजय प्राप्त कर सकते थे, उन पर हमको यह समय विजयी बना देता है। जिन पर हमकिसी शत्रु से अधिकार पा सकते थे उन पर समय और शरीर के शक्तिहीन हो जाने पर भी हमको विजयी बनादेता है। आज पूरे वर्ष भर पश्चात प्रताप ने इस घर में पर्दापण किया। सुशीला की आँखें बन्द थीं , पर मुखमण्डलऐसा विकसित था, जैसे प्रभातकाल का कमल। आज भोर ही से वह रट लगाये हुए थी कि लल्लू को दिखा दो।सुवामा ने इसीलिए विरजन को भेजा था।


सुवामा ने कहा- बहिन। आँखें खोलो लल्लू खड़ा है।

सुशीला ने आँखें खोल दीं और दोनों हाथ प्रेम-बाहुल्य से फैला दिये। प्रताप के हृदय से विरोध का अन्तिम चिह्न भीविलीन हो गया। यदि ऐसे काल में भी कोई मत्सर का मैल रहने दे, तो वह मनुष्य कहलाने का हकदार नहीं है।प्रताप सच्चे पुत्रत्व-भाव से आगे बढ़ा और सुशीला के प्रेमांक में जा लिपटा। दोनों आधे घंटे तक रोते रहे। सुशीलाउसे अपने दोनों बाँहों में इस प्रकार दबाये हुए थी मानों वह कहीं भागा जा रहा है। वह इस समय अपने को सैंकडोंधिक्कार दे रहा था कि मैं ही इस दुखिया का प्राणहारी हूँ मैने ही द्वेष-दुरावेग के वशीभूत होकर इसे इस गति कोपहुँचाया है। मैं ही इस प्रेम की मूर्ति का नाशक हूँ ज्यों-ज्यों यह भावना उसके मन में उठती, उसकी आंखों से आँसूबहते। नादान सुशीला बोली- लल्लू। अब मैं दो-एक दिन की ओर मेहमान हूँ। मेरा जो कुछ कहा-सुना हो, क्षमाकरो।


प्रताप का स्वर उसके वश में था, इसलिए उसने कुछ उतर दिया।

सुशीला फिर बोली- जाने क्यों तुम मुझसे रुष्ट हो। तुम हमारे घर नही आते। हमसे बोलते नहीं। जी तुम्हें प्यारकरने को तरस-तरसकर रह जाता है। पर तुम मेरी तनिक भी सुधि नहीं लेते। बताओ अपनी दुखिया चाची से क्योंरूष्ट हो ? ईश्वर जानता है, मैं तुमको सदा अपना लड़का समझती रही। तुम्हें देखकर मेरी छाती फूल उठती थी। यहकहते-कहते निर्बलता के कारण उसकी बोली धीमी हो गयी, जैसे क्षितिज के अथाह विस्तार में उड़नेवाले पक्षी कीबोली प्रतिक्षण मध्यम होती जाती है-यहाँ तक कि उसके शब्द का ध्यानमात्र शेष रह जाता है। इसी प्रकार सुशीलाकी बोली धीमी होते-होते केवल साँय-साँय रह गई




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