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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Tuesday, December 29, 2009

हिमपात : कैलिफ़ोर्निया में टाहो झील के किनारे

एक बालगीत

हिमपात 
कैलिफ़ोर्निया में टाहो झील के किनारे

शकुन्तला बहादुर





http://thestormking.com/tahoe_nuggets/Nugget_172/Nugget__172_A_April_23_Snowfall.jpg



ऊँचे पर्वत पर हम आए ।
मन में हैं खुशियाँ भर लाए।।

पाइन के हैं वृक्ष बड़े ।
सीधे हैं प्रहरी से खड़े।।

देखो झरती कैसे झर झऱ।
गिरती जाती बर्फ़ निरन्तर।।

बरस रही है सभी तरफ़।
दुग्ध-धवल सी दिखे बरफ़।।

आज हुआ कैसा हिमपात।
ढक गइ धरा, ढके तरुपात।।

ऐसा लगे शीत के भय से।
सूरज भी न निकला घर से।।

बादल की वह ओढ़ रज़ाई।
बिस्तर में छिप लेटा भाई।।

हैं मकान सब ढके बर्फ़ से।
बन्द रास्ते हुए बर्फ़ से ।।

देखो बाहर ज़रा निकलकर ।
चलो बर्फ़ में सँभल सँभल कर।।

बरफ़ थपेड़े दे गालों पर।
जूतों में गल जाए पिघलकर।।

ऊँचे कोमल बर्फ़ के गद्दे।
बिछे हुए हैं इस भू पर।।

मन करता है उन पर लोटें।
बच्चों के संग हिलमिल कर।।

बर्फ़ के लड्डू बना बना कर।
बालक खेलें खुश हो हो कर।।

मारें इक दूजे को हँस कर।
फिर भागें किलकारी भर कर।।

और कभी मन होता ऐसा।
बचपन में देखा था जैसा।।

बर्फ़ का चूरा हाथ में लेकर।
उस पर शर्बत लाल डाल कर।।

चुस्की लेकर उसको खाएँ।
घिसी बरफ़ का लुत्फ़ उठाएँ।।

दृश्य मनोरम बड़ा यहाँ है।
अपना मन खो गया यहाँ है।।

** ** ** **

Saturday, December 5, 2009

रोमांचकारी `मास्टरपीस' by ए. आर. रहमान


रोमांचकारी `मास्टरपीस' by ए. आर. रहमान



ए. आर. रहमान द्वारा निर्मित इस रोमांचकारी `मास्टरपीस' को देखना सुनना आप को रुला सकता है, भावविह्वल कर सकता है| भारत के सभी श्रेष्ठ गायक और वादक स्वयं इसमें सम्मिलित हैं और शब्द हैं कवीन्द्र रवीन्द्र के |









राष्‍ट्र–गान जन-गण-मन गाने के लिए नियम        
साभार : हिन्दी मीडिया


भारत का राष्‍ट्र गान अनेक अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। राष्‍ट्र गान के सही संस्‍करण के बारे में समय समय पर अनुदेश जारी किए गए हैं, इनमें वे अवसर जिन पर इसे बजाया या गाया जाना चाहिए और इन अवसरों पर उचित गौरव का पालन करने के लिए राष्‍ट्र गान को सम्‍मान देने की आवश्‍यकता के बारे में बताया जाता है। सामान्‍य सूचना और मार्गदर्शन के लिए इस सूचना पत्र में इन अनुदेशों का सारांश निहित किया गया है।


उपरोक्‍त राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण है और इसकी कुल अवधि लगभग 52 सेकंड है।

राष्‍ट्र गान की पहली और अंतिम पंक्तियों के साथ एक संक्षिप्‍त संस्‍करण भी कुछ विशिष्‍ट अवसरों पर बजाया जाता है। इसे इस प्रकार पढ़ा जाता है:


जन-गण-मन अधिनायक, जय हे
भारत-भाग्‍य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।

 

संक्षिप्‍त संस्‍करण को चलाने की अवधि लगभग 20 सेकंड है।

जिन अवसरों पर इसका पूर्ण संस्‍करण या संक्षिप्‍त संस्‍करण चलाया जाए, उनकी जानकारी इन अनुदेशों में उपयुक्‍त स्‍थानों पर दी गई है।





राष्‍ट्र गान बजाना



1.    राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर बजाया जाएगा:



i.    नागरिक और सैन्‍य अधिष्‍ठापन



ii.    जब राष्‍ट्र सलामी देता है (अर्थात इसका अर्थ है राष्‍ट्रपति या संबंधित राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों के अंदर राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर को विशेष अवसरों पर राष्‍ट्र गान के साथ राष्‍ट्रीय सलामी - सलामी शस्‍त्र प्रस्‍तुत किया जाता है);



iii.    परेड के दौरान - चाहे उपरोक्‍त (ii) में संदर्भित विशिष्‍ट अतिथि उपस्थित हों या नहीं;



iv.    औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सरकार द्वारा आयोजित अन्‍य कार्यक्रमों में राष्‍ट्रपति के आगमन पर और सामूहिक कार्यक्रमों में तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के अवसर पर ;



v.    ऑल इंडिया रेडियो पर राष्‍ट्रपति के राष्‍ट्र को संबोधन से तत्‍काल पूर्व और उसके पश्‍चात;



vi.    राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर के उनके राज्‍य/संघ राज्‍य के अंदर औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों में आगमन पर तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के समय;



vii.    जब राष्‍ट्रीय ध्‍वज को परेड में लाया जाए;



viii.    जब रेजीमेंट के रंग प्रस्‍तुत किए जाते हैं;



ix.    नौ सेना के रंगों को फहराने के लिए।



2.    राष्‍ट्र गान का संक्षिप्‍त संस्‍करण मेस में सलामती की शुभकामना देते समय बजाया जाएगा।



3.    राष्‍ट्र गान उन अन्‍य अवसरों पर बजाया जाएगा जिनके लिए भारत सरकार द्वारा विशेष आदेश जारी किए गए हैं।



4.    आम तौर पर राष्‍ट्र गान प्रधानमंत्री के लिए नहीं बजाया जाएगा जबकि ऐसा विशेष अवसर हो सकते हैं जब इसे बजाया जाए।



5.    जब राष्‍ट्र गान एक बैंड द्वारा बजाया जाता है तो राष्‍ट्र गान के पहले श्रोताओं की सहायता हेतु ड्रमों का एक क्रम बजाया जाएगा ताकि वे जान सकें कि अब राष्‍ट्र गान आरंभ होने वाला है। अन्‍यथा इसके कुछ विशेष संकेत होने चाहिए कि अब राष्‍ट्र गान को बजाना आरंभ होने वाला है। उदाहरण के लिए जब राष्‍ट्र गान बजाने से पहले एक विशेष प्रकार की धूमधाम की ध्‍वनि निकाली जाए या जब राष्‍ट्र गान के साथ सलामती की शुभकामनाएं भेजी जाएं या जब राष्‍ट्र गान गार्ड ऑफ ओनर द्वारा दी जाने वाली राष्‍ट्रीय सलामी का भाग हो। मार्चिंग ड्रिल के संदर्भ में रोल की अवधि धीमे मार्च में सात कदम होगी। यह रोल धीरे से आरंभ होगा, ध्‍वनि के तेज स्‍तर तक जितना अधिक संभव हो ऊंचा उठेगा और तब धीरे से मूल कोमलता तक कम हो जाएगा, किन्‍तु सातवीं बीट तक सुनाई देने योग्‍य बना रहेगा। तब राष्‍ट्र गान आरंभ करने से पहले एक बीट का विश्राम लिया जाएगा।





राष्‍ट्र गान को सामूहिक रूप से गाना



1.    राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर सामूहिक गान के साथ बजाया जाएगा:



i.    राष्‍ट्रीय ध्‍वज को फहराने के अवसर पर, सांस्‍कृतिक अवसरों पर या परेड के अलावा अन्‍य समारोह पूर्ण कार्यक्रमों में। (इसकी व्‍यवस्‍था एक कॉयर या पर्याप्‍त आकार के, उपयुक्‍त रूप से स्‍थापित तरीके से की जा सकती है, जिसे बैंड आदि के साथ इसके गाने का समन्‍वय करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। इसमें पर्याप्‍त सार्वजनिक श्रव्‍य प्रणाली होगी ताकि कॉयर के साथ मिलकर विभिन्‍न अवसरों पर जनसमूह गा सके);



ii.    सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में राष्‍ट्रपति के आगमन के अवसर पर (परंतु औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सामूहिक कार्यक्रमों के अलावा) और इन कार्यक्रमों से उनके विदा होने के तत्‍काल पहले।



2.    राष्‍ट्र गान को गाने के सभी अवसरों पर सामूहिक गान के साथ इसके पूर्ण संस्‍करण का उच्‍चारण किया जाएगा।



3.    राष्‍ट्र गान उन अवसरों पर गाया जाए, जो पूरी तरह से समारोह के रूप में न हो, तथापि इनका कुछ महत्‍व हो, जिसमें मंत्रियों आदि की उपस्थिति शामिल है। इन अवसरों पर राष्‍ट्र गान को गाने के साथ (संगीत वाद्यों के साथ या इनके बिना) सामूहिक रूप से गायन वांछित होता है।



4.    यह संभव नहीं है कि अवसरों की कोई एक सूची दी जाए, जिन अवसरों पर राष्‍ट्र गान को गाना (बजाने से अलग) गाने की अनुमति दी जा सकती है। परन्‍तु सामूहिक गान के साथ राष्‍ट्र गान को गाने पर तब तक कोई आपत्ति नहीं है जब तक इसे मातृ भूमि को सलामी देते हुए आदर के साथ गाया जाए और इसकी उचित ग‍रिमा को बनाए रखा जाए।



5.    विद्यालयों में, दिन के कार्यों में राष्‍ट्र गान को सामूहिक रूप से गा कर आरंभ किया जा सकता है। विद्यालय के प्राधिकारियों को राष्‍ट्र गान के गायन को लोकप्रिय बनाने के लिए अपने कार्यक्रमों में पर्याप्‍त प्रावधान करने चाहिए तथा उन्‍हें छात्रों के बीच राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रति सम्‍मान की भावना को प्रोत्‍साहन देना चाहिए।






सामान्‍य



1.    जब राष्‍ट्र गान गाया या बजाया जाता है तो श्रोताओं को सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। यद्यपि जब किसी चल चित्र के भाग के रूप में राष्‍ट्र गान को किसी समाचार की गतिविधि या संक्षिप्‍त चलचित्र के दौरान बजाया जाए तो श्रोताओं से अपेक्षित नहीं है कि वे खड़े हो जाएं, क्‍योंकि उनके खड़े होने से फिल्‍म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्‍ट्र गान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी।



2.    जैसा कि राष्‍ट्र ध्‍वज को फहराने के मामले में होता है, यह लोगों की अच्‍छी भावना के लिए छोड दिया गया है कि वे राष्‍ट्र गान को गाते या बजाते समय किसी अनुचित गतिविधि में संलग्‍न नहीं हों।












Saturday, November 14, 2009

काबुलीवाला : बालदिवस पर विशेष

बालदिवस पर विशेष

काबुलीवाला
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 





http://pustak.org/bs/booksimage_M/6152kabuli%20vala%20m.jpg
मेरी पाँच बरस की लड़की मिनी से घड़ीभर भी बोले बिना नहीं रहा जाता। एक दिन वह सवेरे-सवेरे ही बोली, "बाबूजी, रामदयाल दरबान है न, वह ‘काक’ को ‘कौआ’ कहता है। वह कुछ जानता नहीं न, बाबूजी।" मेरे कुछ कहने से पहले ही उसने दूसरी बात छेड़ दी। "देखो, बाबूजी, भोला कहता है – आकाश में हाथी सूँड से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबूजी, भोला झूठ बोलता है, है न?" और फिर वह खेल में लग गई।


मेरा घर सड़क के किनारे है। एक दिन मिनी मेरे कमरे में खेल रही थी। अचानक वह खेल छोड़कर खिड़की के पास दौड़ी गई और बड़े ज़ोर से चिल्लाने लगी, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले!"

कँधे पर मेवों की झोली लटकाए, हाथ में अँगूर की पिटारी लिए एक लंबा सा काबुली धीमी चाल से सड़क पर जा रहा था। जैसे ही वह मकान की ओर आने लगा, मिनी जान लेकर भीतर भाग गई। उसे डर लगा कि कहीं वह उसे पकड़ न ले जाए। उसके मन में यह बात बैठ गई थी कि काबुलीवाले की झोली के अंदर तलाश करने पर उस जैसे और भी दो-चार बच्चे मिल सकते हैं।

काबुली ने मुसकराते हुए मुझे सलाम किया। मैंने उससे कुछ सौदा खरीदा। फिर वह बोला, "बाबू साहब, आप की लड़की कहाँ गई?"

मैंने मिनी के मन से डर दूर करने के लिए उसे बुलवा लिया। काबुली ने झोली से किशमिश और बादाम निकालकर मिनी को देना चाहा पर उसने कुछ न लिया। डरकर वह मेरे घुटनों से चिपट गई। काबुली से उसका पहला परिचय इस तरह हुआ। कुछ दिन बाद, किसी ज़रुरी काम से मैं बाहर जा रहा था। देखा कि मिनी काबुली से खूब बातें कर रही है और काबुली मुसकराता हुआ सुन रहा है। मिनी की झोली बादाम-किशमिश से भरी हुई थी। मैंने काबुली को अठन्नी देते हुए कहा, "इसे यह सब क्यों दे दिया? अब मत देना।" फिर मैं बाहर चला गया।


कुछ देर तक काबुली मिनी से बातें करता रहा। जाते समय वह अठन्नी मिनी की झोली में डालता गया। जब मैं घर लौटा तो देखा कि मिनी की माँ काबुली से अठन्नी लेने के कारण उस पर खूब गुस्सा हो रही है।

काबुली प्रतिदिन आता रहा। उसने किशमिश बादाम दे-देकर मिनी के छोटे से ह्रदय पर काफ़ी अधिकार जमा लिया था। दोनों में बहुत-बहुत बातें होतीं और वे खूब हँसते। रहमत काबुली को देखते ही मेरी लड़की हँसती हुई पूछती, "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले! तुम्हारी झोली में क्या है?"

रहमत हँसता हुआ कहता, "हाथी।" फिर वह मिनी से कहता, "तुम ससुराल कब जाओगी?"

इस पर उलटे वह रहमत से पूछती, "तुम ससुराल कब जाओगे?"

रहमत अपना मोटा घूँसा तानकर कहता, "हम ससुर को मारेगा।" इस पर मिनी खूब हँसती।

हर साल सरदियों के अंत में काबुली अपने देश चला जाता। जाने से पहले वह सब लोगों से पैसा वसूल करने में लगा रहता। उसे घर-घर घूमना पड़ता, मगर फिर भी प्रतिदिन वह मिनी से एक बार मिल जाता।

एक दिन सवेरे मैं अपने कमरे में बैठा कुछ काम कर रहा था। ठीक उसी समय सड़क पर बड़े ज़ोर का शोर सुनाई दिया। देखा तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। रहमत के कुर्ते पर खून के दाग हैं और सिपाही के हाथ में खून से सना हुआ छुरा।

कुछ सिपाही से और कुछ रहमत के मुँह से सुना कि हमारे पड़ोस में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी। उसके कुछ रुपए उस पर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने इनकार कर दिया था। बस, इसी पर दोनों में बात बढ़ गई, और काबुली ने उसे छुरा मार दिया।

इतने में "काबुलीवाले, काबुलीवाले", कहती हुई मिनी घर से निकल आई। रहमत का चेहरा क्षणभर के लिए खिल उठा। मिनी ने आते ही पूछा, "तुम ससुराल जाओगे?"  रहमत ने हँसकर कहा, "हाँ, वहीं तो जा रहा हूँ।"

रहमत को लगा कि मिनी उसके उत्तर से प्रसन्न नहीं हुई। तब उसने घूँसा दिखाकर कहा, "ससुर को मारता पर क्या करुँ, हाथ बँधे हुए हैं।"

छुरा चलाने के अपराध में रहमत को कई साल की सज़ा हो गई।

काबुली का ख्याल धीरे-धीरे मेरे मन से बिलकुल उतर गया और मिनी भी उसे भूल गई।

कई साल बीत गए।

आज मेरी मिनी का विवाह है। लोग आ-जा रहे हैं। मैं अपने कमरे में बैठा हुआ खर्च का हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत सलाम करके एक ओर खड़ा हो गया।

पहले तो मैं उसे पहचान ही न सका। उसके पास न तो झोली थी और न चेहरे पर पहले जैसी खुशी। अंत में उसकी ओर ध्यान से देखकर पहचाना कि यह तो रहमत है।

मैंने पूछा, "क्यों रहमत कब आए?"

"कल ही शाम को जेल से छूटा हूँ," उसने बताया।

मैंने उससे कहा, "आज हमारे घर में एक जरुरी काम है, मैं उसमें लगा हुआ हूँ। आज तुम जाओ, फिर आना।"

वह उदास होकर जाने लगा। दरवाजे़ के पास रुककर बोला, "ज़रा बच्ची को नहीं देख सकता?"

शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब भी वैसी ही बच्ची बनी हुई है। वह अब भी पहले की तरह "काबुलीवाले, ओ काबुलीवाले" चिल्लाती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों की उस पुरानी हँसी और बातचीत में किसी तरह की रुकावट न होगी। मैंने कहा, "आज घर में बहुत काम है। आज उससे मिलना न हो सकेगा।"

वह कुछ उदास हो गया और सलाम करके दरवाज़े से बाहर निकल गया।

मैं सोच ही रहा था कि उसे वापस बुलाऊँ। इतने मे वह स्वयं ही लौट आया और बोला, “यह थोड़ा - सा मेवा बच्ची के लिए लाया था। उसको दे दीजिएगा।"

मैने उसे पैसे देने चाहे पर उसने कहा, "आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब! पैसे रहने दीजिए।'फिर ज़रा ठहरकर बोला, “आपकी जैसी मेरी भी एक बेटी है। मैं उसकी याद कर-करके आपकी बच्ची के लिए थोड़ा-सा मेवा ले आया करता हूँ। मैं यहाँ सौदा बेचने नहीं आता।"

उसने अपने कुरते की जेब में हाथ डालकर एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकला औऱ बड़े जतन से उसकी चारों तह खोलकर दोनो हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया। देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हें से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप हैं। हाथ में थोड़ी-सी कालिख लगाकर, कागज़ पर उसी की छाप ले ली गई थी। अपनी बेटी की इस याद को छाती से लगाकर, रहमत हर साल कलकत्ते के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है।

देखकर मेरी आँखें भर आईं। सबकुछ भूलकर मैने उसी समय मिनी को बाहर बुलाया। विवाह की पूरी पोशाक और गहने  पहने मिनी शरम से सिकुड़ी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।

उसे देखकर रहमत काबुली पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में वह हँसते हुए बोला, “लल्ली! सास के घर जा रही हैं क्या?”

मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी। मारे शरम के उसका मुँह लाल हो उठा।


मिनी के चले जाने पर एक गहरी साँस भरकर रहमत ज़मीन पर बैठ गया। उसकी समझ में यह बात एकाएक स्पष्ट हो उठी कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? वह उसकी याद में खो गया।

मैने कुछ रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिए और कहा, “रहमत! तुम अपनी बेटी के पास देश चले जाओ।"






Tuesday, November 3, 2009

नेशनल थियेटर फेस्टिवल फॉर चिल्ड्रेन




नेशनल थियेटर फेस्टिवल फॉर चिल्ड्रेन ( राष्ट्रीय बाल- रंगमच समारोह ) 
१-१४ नवम्बर


बालदिवस के आयोजनों की कड़ी में हो रहे कार्यक्रमों में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम है - नेशनल थियेटर फेस्टीवल फॉर चिल्ड्रेन ( राष्ट्रीय  बाल- रंगमच समारोह ) १-१४ नवम्बर | इसमें सम्मिलित प्रस्तुतियों और स्थल आदि की जानकारी नीचे के चित्र में उल्लिखित है|  आप चित्र को क्लिक कर के बड़े आकार में स्पष्ट देख सकते हैं | बच्चे इस  आयोजन के सहभागी बनें व समारोह का आनंद लें |

बालदिवस की अग्रिम शुभकामनाओं सहित |






Wednesday, September 30, 2009

माँ का दिल सागर अगम


माँ का दिल सागर अगम
डॉ.योगेन्द्र नाथ शर्मा'अरुण'


 

जब तक माँ जग में रहे, बेटा बेटा होय!
माँ छोडे तो कुछ नहीं,बेटा चुपचुप रोय!!

ममता बन साकार माँ,जग में लेती रूप!
शीतलता संतान को, खुद ले लेती धूप !!

जब तक माँ का साथ है, नहीं चाहिए और!
माँ जिस दिन संग छोड़ती,मिले न कोई ठौर!!

माँ का दिल सागर अगम,जिसका ओर न छोर!
माँ के बिन संतान है, ज्यों पतंग बिन डोर !!

प्रभु रूठे माँ ठौर है, माँ तो रूठे नाहि ! 

प्रभु को चाहो देखना, देखो माँ मन माहि!!

माँ धरती का रूप है, दिव्य क्षमा साकार !
सागर सा दिल माँ लिए, नित करती उपकार!!

माँ मर जाए जन्म दे, फिर भी रहती पास !
रोम-रोम में नित रमे, याद करे हर साँस !!

माँ का ऋण चुकता नहीं, करलो जतन हज़ार!
दो आँसू बस भाव के, कर दें बेडा पार !!

माँ केवल अहसास है, जैसे पुष्प - सुगंध !
रमी रहे मन में सदा, तोड़ जगत के बंध !!

माँ मेरी पहचान है, माँ से पाई देह !
नित्य रहेगी भाव बन, नहीं तनिक संदेह!!
____________ _______



-- पूर्व प्राचार्य,
७४/३,न्यू नेहरु नगर,रुड़की-२४७६६७

Monday, September 28, 2009

बस इसीलिए ..........



बस इसीलिए जग शिक्षक के चरणों में शीश नवाता है
-
ऋषभदेव शर्मा







|| शिक्षा मानव का आभूषण
शिक्षा मानव का शृंगार
शिक्षक जीवन के निर्माता
शिक्षक विद्या के आगार ||




शिक्षक समाज के गौरव हैं
वे ज्ञान दीप लेकर चलते
वे अंधकार के दुश्मन हैं
हम उनकी आभा में पलते




शिक्षक पहले खुद जगते हैं
फिर सर्व समाज जगाते हैं
वे देते वैज्ञानिक चिंतन
झूठे विश्वास भगाते हैं




शिक्षक श्रद्धा के पात्र सदा
उनके शब्दों में सार भरा
वे सृजन करें नव पीढ़ी का
यह उनके ही सिर भार धरा




शिक्षक समाज के पथदर्शक
शिक्षक समाज के रक्षक हैं
शिक्षक हैं पोषक मूल्यों के
शिक्षक संस्कृति संरक्षक हैं




है शिक्षक का सम्मान जहाँ
वह सभ्य समाज कहाता है
बस इसीलिए जग शिक्षक के
चरणों में शीश नवाता है |

Friday, August 14, 2009

वन्देमातरम् (मूल व अनुवाद)

वन्देमातरम् (मूल व अनुवाद)


वन्दे मातरम्

सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलां मातरम् 

शुभ्रज्योत्स्ना-पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम् 
सुखदां वरदां मातरम् ॥


कोटि-कोटि कण्ठ कलकल निनाद कराले
कोटि-कोटि भुजैर्धृत खरकरवाले
के बोले मा तुमि अबले 
बहुबल धारिणीम् , नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीम् मातरम् ॥
वन्दे मातरम् 


तुमि विद्या तुमि धर्म, तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणा: शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति,
हृदये तुमि मा भक्ति,
तोमार हि प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे ॥
वन्दे मातरम्


त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदल विहारिणी
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥





Translation by Shree Aurobindo


Mother, I bow to thee!
Rich with thy hurrying streams,
bright with orchard gleams,
Cool with thy winds of delight,
Dark fields waving Mother of might,
Mother free. Glory of moonlight dreams,
Over thy branches and lordly streams,
Clad in thy blossoming trees,
Mother, giver of ease
Laughing low and sweet!
Mother I kiss thy feet,
Speaker sweet and low!
Mother, to thee I bow.
Who hath said thou art weak in thy lands
When the sword flesh out in the seventy million hands
And seventy million voices roar
Thy dreadful name from shore to shore?
With many strengths who art mighty and stored,
To thee I call Mother and Lord!
Though who savest, arise and save!
To her I cry who ever her foeman drove
Back from plain and Sea
And shook herself free.
Thou art wisdom, thou art law,
Thou art heart, our soul, our breath
Though art love divine, the awe
In our hearts that conquers death.
Thine the strength that nervs the arm,
Thine the beauty, thine the charm.
Every image made divine
In our temples is but thine.

Thou art Durga, Lady and Queen,
With her hands that strike and her
swords of sheen,
Thou art Lakshmi lotus-throned,
And the Muse a hundred-toned,
Pure and perfect without peer,
Mother lend thine ear,
Rich with thy hurrying streams,
Bright with thy orchard gleems,
Dark of hue O candid-fair In thy soul, with jewelled hair
And thy glorious smile divine,
Lovilest of all earthly lands,
Showering wealth from well-stored hands!
Mother, mother mine!
Mother sweet, I bow to thee,
Mother great and free!

Wednesday, June 3, 2009

कट जाएँगे मेरे बाल...


कट जाएँगे मेरे बाल...





गर्मी की छुट्टी आई है।
दीदी की मस्ती छायी है॥
पर देखो, मैं हूँ बेहाल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥



मम्मी कहती फँसते हैं ये।
डैडी कहते ‘हँसते हैं’ ये॥
दीदी कहती ‘हैं जंजाल’।
कट जाएँगे मेरे बाल॥



मुण्डन को है गाँव में जाना।
परम्परा से बाल कटाना॥
नाऊ की कैंची बदहाल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥




गाँव-गीत की लहरी होगी।
मौसी-मामी शहरी होंगी॥
ढोल - नगाड़े देंगे ताल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥



दादा – दादी, ताऊ – ताई।
चाचा-चाची, बहनें – भाई॥
सभी करेंगे वहाँ धमाल।
कट जाएँगे मेरे बाल



बूआ सब आँचल फैलाए।
बैठी होंगी दाएँ - बाएँ॥
हो जाएँगी मालामाल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥




‘कोट माई’* के दर जाएँगे।
कटे बाल को धर आएँगे॥
‘माँ’ रखती है हमें निहाल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥



हल्दी, चन्दन, अक्षत, दही।
पूजा की थाली खिल रही॥
चमक उठेगा मेरा भाल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥




मम्मी रोज करें बाजार।
गहने, कपड़े औ’ श्रृंगार॥
बटुआ ढीला - डैडी ‘लाल’।
कट जाएँगे मेरे बाल॥





अब तो होगी मेरी मौज।
नये खिलौनों की है फौज॥
मुण्डन होगा बड़ा कमाल।
कट जाएँगे मेरे बाल॥





[कोट माई: गाँव की अधिष्ठात्री देवी जिनके पीठ-स्थल पर जाकर माथा टेकना सभी ग्रामवासियों की श्रद्धा का विषय है।]


- सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
२८ मई




Saturday, February 28, 2009

शारीरिक यंत्रणा : हम हैं तालिबानी संस्करण





अपने से निर्बल पर सबल द्वारा अत्याचार या मार पीट की घटनाएँ लगभग संसार की सबसे बड़ी यथार्थ हैं। सामंतशाही की यह इतनी साधारण घटना है कि पति द्वारा पत्नी को पीटा जाना तो मानो उसका जन्मसिद्ध या पतीत्वसिद्ध जायज अधिकार माना जाता है। इधर इस निरंकुश अहमन्यता के तालिबानी उदाहरण हाल -फिलहाल देखने को मिले हैं . और तो और अब तो भारत में कई बार बूढे माता-पिता तक को पीटा जाना भी सुना देखा जाता रहा है।


कल ही भारत में ऑस्कर -विजेता फिल्म के बाल कलाकार अज़हरुद्दीन की धारावी में उसके पिता द्वारा की गयी पिटाई का समाचार दर्शकों ने जाना सुना। उस पर आई प्रतिक्रियाओं के साथ ही यह प्रश्न भी उठाया गया कि क्या माता -पिता द्वारा अपनी संतान की पिटाई उचित है ? या अनुचित है ? क्या इसे शारीरिक अत्याचार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए अथवा नहीं ?



देर रात को ब्लॉग जगत की पोस्ट देखते हुए मैं यकायक महाशक्ति ब्लॉग पर पहुँची ( पिता बच्‍चे को मार दे तो यह भी मीडिया की खबर होती है)

यहाँ बताया गया था कि
" इनकी किस्मत में आई चांदनी पर फिर से स्लम का अंधेरा छाने लगा है। गुरुवार को ही ऑस्कर समारोह से घर लौटने वाले अजहरुद्दीन को उसके बाप ने मामूली सी बात पर पिटाई कर दी । स्लमडॉग में यंग हीरो का रोल करने वाला 10 साल का अजहर मुंबई में धारावी के स्लम इलाके में रहता है। लॉस ऐंजिलिस में स्लमडॉग को 8 ऑस्कर पुरस्कार मिले हैं। अजहर भी इस समारोह में शामिल होने के लिए वहां पहुंचा था। गुरुवार को ही घर लौटे अजहर को उस दिन मीडिया के लोगों, मित्रों और पड़ोसियों ने घेरे रखा। जबकि लॉस ऐंजिलिस से लंबी यात्रा कर लौटा अजहर थक गया था और आराम करना चाहता था। इसी कारण वह शुक्रवार को स्कूल भी नहीं गया। पर शुक्रवार को भी मीडिया के लोग और कुछ अन्य लोग उससे मिलना चाहते थे। वे उसके घर आने लगे, जबकि अजहर सोना चाहता था।

उसके पिता 45 साल के मुहम्मद इस्माइल को यह बात नागवार गुजर रही थी। उसे यह लग रहा है कि अजहर ही उन्हें इस स्लम से बाहर निकालने की टिकट है। लेकिन जब अजहर लोगों से मिलने नहीं निकला और उसने जोर से चिल्ला कर यह कहा कि अभी वह किसी से मिलना नहीं चाहता तो उन्होंने अजहर की जमकर लात-घूंसों से पिटाई कर दी।सबके सामने पिटता अजहर रोता-चिल्लाता हुआ घर के अंदर भागा। पर घर के अंदर भी बाप ने उसे दो-चार हाथ जड़ दिए। हालांकि बाद में टीबी के मरीज इस्माइल ने अपने इस व्यवहार के लिए अजहर से माफी मांगी। उन्होंने कहा, मैं अजहर से बहुत प्यार करता हूं। मुझे उसपर गर्व है। बस मैं पता नहीं कैसे कुछ देर के लिए अपना आपा खो बैठा था।जिस दिन अजहर मुंबई लौटा था, उस दिन भी अजहर के पिता कई बातों पर नाराज होते रहे। अजहर को जिस कार में बिठाया गया था, उसमें उन्हें जगह नहीं मिल पाई थी तो वह कार की छत पर ही बैठ गए थे। अजहर की पिटाई की खबर फोटो सहित इंग्लैंड के सन अखबार में छपी है। इस बात पर वहां हंगामा मचा हुआ है। लोगों और मानवाधिकार संस्थाओं ने इस बात पर बवेला मचाना शुरू कर दिया है।

नोट : इस पोस्‍ट को बाल हिंसा के सर्मथन के रूप में न देखा जाये, हमें न पता था कि पुत्र और पिता के रिश्‍तो में मीडिया भूमिका अहम हो जायेगी। जो भी इस पोस्‍ट को पढ़ रहा होगा, कभी न कभी वह अपने पिता-माता-भाई से मार न खाया हो। अगर खाया भी होगा तो शायद ही आज उस मार की किसी को खुन्‍नस होगी ?




इस प्रविष्टि व इस पर आई प्रतिक्रियाओं को पढ़ कर मुझे दंग रह जाना पड़ा। प्रतिक्रियाएँ थीं, देखिए

PN Subramanian said...

मात्र एक अदने से पुत्र का पिता होता तो खबर नहीं बनती. यहाँ एक सेलेब्रिटी किड है.

राज भाटिय़ा said...

मुझे मेरे पिता जी ने खुब मारा है, लेकिन मै उन की पुरी इज्जत करता हुं, मै क्या जो भी आप की यह पोस्ट पढे गा उन सब ने अपने पिता से भाई बहिन से, मां से जरुर मार खाई हो गी , यह मार एक प्यार होती है, ओर जो मिडिया वाले चिल्ला रहे है , क्या उन्होने नही खाई अपने मां बाप से मार ?? ओर जो यह इग्लेंड वाले चीख रहे है, इन्हे क्या पता मां ओर बाप का प्यार, क्योकि यह तो छोटे छोटे बच्चो को छोड कर अलग अलग रहते है, ओर बाते करते है ....
धन्यवाद





मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। हमारे भीतर यह औरंगजेबी प्रवृत्ति कैसे व कब मुँह उठाती है, वास्तव में देखने की चीज है, चिंता की बात है। अंत में उद्विग्न हो कर कुछ कड़वी टिप्पणी मुझे विवश हो लिखनी पड़ी, रुका नहीं गया। वही अपनी बात यहाँ दुहरा रही हूँ -

माता-पिता द्वारा या अपने परिवार के बड़े बुजुर्गों द्वारा डाँट या मार खाना कोई अत्याचार नहीं है- यह बात सोलह आने सही है। हम आप में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने अपने माता-पिता द्वारा की गई पिटाई का स्वाद न चखा हो। ऐसा वे अपने बच्चों के भले की भावना या सुधार के लिए ही करते हैं,इसमें भी कोई दो राय नहीं हैं।


किन्तु यहाँ मामला दूसरा है, यहाँ बच्चे को कमाई का संसाधन,स्रोत,या पैसा उगाहने की मशीन बनने से इन्कार करने ( वह भी उसकी स्वाभाविक प्राकृतिक आवश्यकता की विवशता की घड़ी में) पीटा गया है। क्या यह निर्दयता नहीं है? राक्षसपन नहीं है? एक छोटा बच्चा जो जेटलैग से त्रस्त है, थका है, उसे धन्धे की लिए उतरने को मजबूर करने जैसा ही तो है यह।

माता-पिता द्वारा अमूमन की जाने वाली पिटाई और इस पिटाई में यह बड़ा अन्तर है। इसकी निन्दा व भर्त्स्ना की जानी चाहिए। बालमजदूरी के लिए विवश करना ही तो है यह। आप लोग कैसे निर्दयी हैं जो यह भी नहीं देखते! और पश्चिम को कोसने का अवसर मिलने पर झट से अपनी हर चीज को जायज व उनकी हर बात को नाजायज सिद्ध करने लगते हैं!!
कमाल है!!!

Friday, February 20, 2009

फेसबुक, माइस्पेस से कैंसर का खतरा



फेसबुक, माइस्पेस से कैंसर का खतरा


लंदन

क्या आप फेसबुक या माइस्पेस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं? यदि हां, तो आपके लि एक बुरी खबर है। इन वेबसाइटों के ज्यादा उपयोग से कैंसर और डिमेंशिया जैसे खतरनाक रोगों के साथ-सा हृदसंबंधी बीमारियां का खतरा बढ़ सकता है। एक विज्ञान पत्रिका में यह दावा किया गया

है।


मनोचिकित्सक एरिक सिग्मैन ने 'बायलाजिस्ट' नाम के शोधपत्र में लिखा है, 'लोगों से मिलने के बजाय नेट पर घंटों बातचीत करने का सेहत पर घातक असर पड़ सकता है।' एरिक के हवाले से डेली मेल ने कहा, 'कैंसर, डिमेंशिया और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। अकेलेपन का रोग प्रतिरोधक क्षमता, हार्मोन के स्तर व धमनियों के कार्य करने पर असर पड़ता है। मानसिक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।'


सिग्मैन ने कहा कि हालांकि ये साइटें आपसी संपर्को को बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गईं। लेकिन ये लोगों का एकाकीपन बढ़ा रही हैं। शोध बताते हैं कि 1987 से अब तक मिल बैठकर बातचीत करने के घंटों में काफी कमी आई है।


सिग्मैन ने कहा कि संबंधों को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हार्मोन आक्सीटासिन लोगों के सामने होने और नहीं होने पर अलग-अलग ढंग से स्रावित होता है। उन्होंने कहा, 'नेटवर्किंग साइटों को हमारे सामाजिक जीवन में इजाफा करना चाहिए। लेकिन अध्ययन में विपरीत परिणाम देखने को मिले।' उन्होंने कहा कि शोध में नेटवर्किंग साइटों से प्रभावित 209 तरह के जीन की पहचान की गई। इनमें प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करने वाले और तनाव को नियंत्रित करने वाले जीन शामिल हैं।

(जागरण )



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