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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Saturday, February 28, 2009

शारीरिक यंत्रणा : हम हैं तालिबानी संस्करण





अपने से निर्बल पर सबल द्वारा अत्याचार या मार पीट की घटनाएँ लगभग संसार की सबसे बड़ी यथार्थ हैं। सामंतशाही की यह इतनी साधारण घटना है कि पति द्वारा पत्नी को पीटा जाना तो मानो उसका जन्मसिद्ध या पतीत्वसिद्ध जायज अधिकार माना जाता है। इधर इस निरंकुश अहमन्यता के तालिबानी उदाहरण हाल -फिलहाल देखने को मिले हैं . और तो और अब तो भारत में कई बार बूढे माता-पिता तक को पीटा जाना भी सुना देखा जाता रहा है।


कल ही भारत में ऑस्कर -विजेता फिल्म के बाल कलाकार अज़हरुद्दीन की धारावी में उसके पिता द्वारा की गयी पिटाई का समाचार दर्शकों ने जाना सुना। उस पर आई प्रतिक्रियाओं के साथ ही यह प्रश्न भी उठाया गया कि क्या माता -पिता द्वारा अपनी संतान की पिटाई उचित है ? या अनुचित है ? क्या इसे शारीरिक अत्याचार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए अथवा नहीं ?



देर रात को ब्लॉग जगत की पोस्ट देखते हुए मैं यकायक महाशक्ति ब्लॉग पर पहुँची ( पिता बच्‍चे को मार दे तो यह भी मीडिया की खबर होती है)

यहाँ बताया गया था कि
" इनकी किस्मत में आई चांदनी पर फिर से स्लम का अंधेरा छाने लगा है। गुरुवार को ही ऑस्कर समारोह से घर लौटने वाले अजहरुद्दीन को उसके बाप ने मामूली सी बात पर पिटाई कर दी । स्लमडॉग में यंग हीरो का रोल करने वाला 10 साल का अजहर मुंबई में धारावी के स्लम इलाके में रहता है। लॉस ऐंजिलिस में स्लमडॉग को 8 ऑस्कर पुरस्कार मिले हैं। अजहर भी इस समारोह में शामिल होने के लिए वहां पहुंचा था। गुरुवार को ही घर लौटे अजहर को उस दिन मीडिया के लोगों, मित्रों और पड़ोसियों ने घेरे रखा। जबकि लॉस ऐंजिलिस से लंबी यात्रा कर लौटा अजहर थक गया था और आराम करना चाहता था। इसी कारण वह शुक्रवार को स्कूल भी नहीं गया। पर शुक्रवार को भी मीडिया के लोग और कुछ अन्य लोग उससे मिलना चाहते थे। वे उसके घर आने लगे, जबकि अजहर सोना चाहता था।

उसके पिता 45 साल के मुहम्मद इस्माइल को यह बात नागवार गुजर रही थी। उसे यह लग रहा है कि अजहर ही उन्हें इस स्लम से बाहर निकालने की टिकट है। लेकिन जब अजहर लोगों से मिलने नहीं निकला और उसने जोर से चिल्ला कर यह कहा कि अभी वह किसी से मिलना नहीं चाहता तो उन्होंने अजहर की जमकर लात-घूंसों से पिटाई कर दी।सबके सामने पिटता अजहर रोता-चिल्लाता हुआ घर के अंदर भागा। पर घर के अंदर भी बाप ने उसे दो-चार हाथ जड़ दिए। हालांकि बाद में टीबी के मरीज इस्माइल ने अपने इस व्यवहार के लिए अजहर से माफी मांगी। उन्होंने कहा, मैं अजहर से बहुत प्यार करता हूं। मुझे उसपर गर्व है। बस मैं पता नहीं कैसे कुछ देर के लिए अपना आपा खो बैठा था।जिस दिन अजहर मुंबई लौटा था, उस दिन भी अजहर के पिता कई बातों पर नाराज होते रहे। अजहर को जिस कार में बिठाया गया था, उसमें उन्हें जगह नहीं मिल पाई थी तो वह कार की छत पर ही बैठ गए थे। अजहर की पिटाई की खबर फोटो सहित इंग्लैंड के सन अखबार में छपी है। इस बात पर वहां हंगामा मचा हुआ है। लोगों और मानवाधिकार संस्थाओं ने इस बात पर बवेला मचाना शुरू कर दिया है।

नोट : इस पोस्‍ट को बाल हिंसा के सर्मथन के रूप में न देखा जाये, हमें न पता था कि पुत्र और पिता के रिश्‍तो में मीडिया भूमिका अहम हो जायेगी। जो भी इस पोस्‍ट को पढ़ रहा होगा, कभी न कभी वह अपने पिता-माता-भाई से मार न खाया हो। अगर खाया भी होगा तो शायद ही आज उस मार की किसी को खुन्‍नस होगी ?




इस प्रविष्टि व इस पर आई प्रतिक्रियाओं को पढ़ कर मुझे दंग रह जाना पड़ा। प्रतिक्रियाएँ थीं, देखिए

PN Subramanian said...

मात्र एक अदने से पुत्र का पिता होता तो खबर नहीं बनती. यहाँ एक सेलेब्रिटी किड है.

राज भाटिय़ा said...

मुझे मेरे पिता जी ने खुब मारा है, लेकिन मै उन की पुरी इज्जत करता हुं, मै क्या जो भी आप की यह पोस्ट पढे गा उन सब ने अपने पिता से भाई बहिन से, मां से जरुर मार खाई हो गी , यह मार एक प्यार होती है, ओर जो मिडिया वाले चिल्ला रहे है , क्या उन्होने नही खाई अपने मां बाप से मार ?? ओर जो यह इग्लेंड वाले चीख रहे है, इन्हे क्या पता मां ओर बाप का प्यार, क्योकि यह तो छोटे छोटे बच्चो को छोड कर अलग अलग रहते है, ओर बाते करते है ....
धन्यवाद





मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। हमारे भीतर यह औरंगजेबी प्रवृत्ति कैसे व कब मुँह उठाती है, वास्तव में देखने की चीज है, चिंता की बात है। अंत में उद्विग्न हो कर कुछ कड़वी टिप्पणी मुझे विवश हो लिखनी पड़ी, रुका नहीं गया। वही अपनी बात यहाँ दुहरा रही हूँ -

माता-पिता द्वारा या अपने परिवार के बड़े बुजुर्गों द्वारा डाँट या मार खाना कोई अत्याचार नहीं है- यह बात सोलह आने सही है। हम आप में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसने अपने माता-पिता द्वारा की गई पिटाई का स्वाद न चखा हो। ऐसा वे अपने बच्चों के भले की भावना या सुधार के लिए ही करते हैं,इसमें भी कोई दो राय नहीं हैं।


किन्तु यहाँ मामला दूसरा है, यहाँ बच्चे को कमाई का संसाधन,स्रोत,या पैसा उगाहने की मशीन बनने से इन्कार करने ( वह भी उसकी स्वाभाविक प्राकृतिक आवश्यकता की विवशता की घड़ी में) पीटा गया है। क्या यह निर्दयता नहीं है? राक्षसपन नहीं है? एक छोटा बच्चा जो जेटलैग से त्रस्त है, थका है, उसे धन्धे की लिए उतरने को मजबूर करने जैसा ही तो है यह।

माता-पिता द्वारा अमूमन की जाने वाली पिटाई और इस पिटाई में यह बड़ा अन्तर है। इसकी निन्दा व भर्त्स्ना की जानी चाहिए। बालमजदूरी के लिए विवश करना ही तो है यह। आप लोग कैसे निर्दयी हैं जो यह भी नहीं देखते! और पश्चिम को कोसने का अवसर मिलने पर झट से अपनी हर चीज को जायज व उनकी हर बात को नाजायज सिद्ध करने लगते हैं!!
कमाल है!!!

Friday, February 20, 2009

फेसबुक, माइस्पेस से कैंसर का खतरा



फेसबुक, माइस्पेस से कैंसर का खतरा


लंदन

क्या आप फेसबुक या माइस्पेस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं? यदि हां, तो आपके लि एक बुरी खबर है। इन वेबसाइटों के ज्यादा उपयोग से कैंसर और डिमेंशिया जैसे खतरनाक रोगों के साथ-सा हृदसंबंधी बीमारियां का खतरा बढ़ सकता है। एक विज्ञान पत्रिका में यह दावा किया गया

है।


मनोचिकित्सक एरिक सिग्मैन ने 'बायलाजिस्ट' नाम के शोधपत्र में लिखा है, 'लोगों से मिलने के बजाय नेट पर घंटों बातचीत करने का सेहत पर घातक असर पड़ सकता है।' एरिक के हवाले से डेली मेल ने कहा, 'कैंसर, डिमेंशिया और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। अकेलेपन का रोग प्रतिरोधक क्षमता, हार्मोन के स्तर व धमनियों के कार्य करने पर असर पड़ता है। मानसिक क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।'


सिग्मैन ने कहा कि हालांकि ये साइटें आपसी संपर्को को बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गईं। लेकिन ये लोगों का एकाकीपन बढ़ा रही हैं। शोध बताते हैं कि 1987 से अब तक मिल बैठकर बातचीत करने के घंटों में काफी कमी आई है।


सिग्मैन ने कहा कि संबंधों को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार हार्मोन आक्सीटासिन लोगों के सामने होने और नहीं होने पर अलग-अलग ढंग से स्रावित होता है। उन्होंने कहा, 'नेटवर्किंग साइटों को हमारे सामाजिक जीवन में इजाफा करना चाहिए। लेकिन अध्ययन में विपरीत परिणाम देखने को मिले।' उन्होंने कहा कि शोध में नेटवर्किंग साइटों से प्रभावित 209 तरह के जीन की पहचान की गई। इनमें प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित करने वाले और तनाव को नियंत्रित करने वाले जीन शामिल हैं।

(जागरण )



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