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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Wednesday, September 30, 2009

माँ का दिल सागर अगम


माँ का दिल सागर अगम
डॉ.योगेन्द्र नाथ शर्मा'अरुण'


 

जब तक माँ जग में रहे, बेटा बेटा होय!
माँ छोडे तो कुछ नहीं,बेटा चुपचुप रोय!!

ममता बन साकार माँ,जग में लेती रूप!
शीतलता संतान को, खुद ले लेती धूप !!

जब तक माँ का साथ है, नहीं चाहिए और!
माँ जिस दिन संग छोड़ती,मिले न कोई ठौर!!

माँ का दिल सागर अगम,जिसका ओर न छोर!
माँ के बिन संतान है, ज्यों पतंग बिन डोर !!

प्रभु रूठे माँ ठौर है, माँ तो रूठे नाहि ! 

प्रभु को चाहो देखना, देखो माँ मन माहि!!

माँ धरती का रूप है, दिव्य क्षमा साकार !
सागर सा दिल माँ लिए, नित करती उपकार!!

माँ मर जाए जन्म दे, फिर भी रहती पास !
रोम-रोम में नित रमे, याद करे हर साँस !!

माँ का ऋण चुकता नहीं, करलो जतन हज़ार!
दो आँसू बस भाव के, कर दें बेडा पार !!

माँ केवल अहसास है, जैसे पुष्प - सुगंध !
रमी रहे मन में सदा, तोड़ जगत के बंध !!

माँ मेरी पहचान है, माँ से पाई देह !
नित्य रहेगी भाव बन, नहीं तनिक संदेह!!
____________ _______



-- पूर्व प्राचार्य,
७४/३,न्यू नेहरु नगर,रुड़की-२४७६६७

Monday, September 28, 2009

बस इसीलिए ..........



बस इसीलिए जग शिक्षक के चरणों में शीश नवाता है
-
ऋषभदेव शर्मा







|| शिक्षा मानव का आभूषण
शिक्षा मानव का शृंगार
शिक्षक जीवन के निर्माता
शिक्षक विद्या के आगार ||




शिक्षक समाज के गौरव हैं
वे ज्ञान दीप लेकर चलते
वे अंधकार के दुश्मन हैं
हम उनकी आभा में पलते




शिक्षक पहले खुद जगते हैं
फिर सर्व समाज जगाते हैं
वे देते वैज्ञानिक चिंतन
झूठे विश्वास भगाते हैं




शिक्षक श्रद्धा के पात्र सदा
उनके शब्दों में सार भरा
वे सृजन करें नव पीढ़ी का
यह उनके ही सिर भार धरा




शिक्षक समाज के पथदर्शक
शिक्षक समाज के रक्षक हैं
शिक्षक हैं पोषक मूल्यों के
शिक्षक संस्कृति संरक्षक हैं




है शिक्षक का सम्मान जहाँ
वह सभ्य समाज कहाता है
बस इसीलिए जग शिक्षक के
चरणों में शीश नवाता है |

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