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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Friday, November 7, 2008

ईर्ष्या

ईर्ष्या
- मुंशी प्रेमचंद



प्रतापचन्द्र ने विरजन के घर आना-जाना विवाह के कुछ दिन पूर्व से ही त्याग दिया था। वह विवाह के किसी भीकार्य में सम्मिलित नहीं हुआ। यहाँ तक कि महफिल में भी गया। मलिन मन किये, मुँह लटकाये, अपने घर बैठारहा, मुंशी संजीवनलाला, सुशीला, सुवामा सब बिनती करके हार गये, पर उसने बारात की ओर दृष्टि फेरी। अंतमें मुंशीजी का मन टूट गया और फिर कुछ बोले। यह दशा विवाह के होने तक थी। विवाह के पश्चात तो उसनेइधर का मार्ग ही त्याग दिया। स्कूल जाता तो इस प्रकार एक ओर से निकल जाता, मानों आगे कोई बाघ बैठा हुआहै, या जैसे महाजन से कोई ऋणी मनुष्य आँख बचाकर निकल जाता है। विरजन की तो परछाई से भागता। यदिकभी उसे अपने घर में देख पाता तो भीतर पग देता। माता समझाती- बेटा! विरजन से बोलते-चालते क्यों नहीं ? क्यों उससे मन मोटा किये हुए हो ? वह -आकर घण्टों रोती है कि मैने क्या किया है जिससे वह रुष्ट हो गया है।देखो , तुम और वह कितने दिनों तक एक संग रहे हो। तुम उसे कितना प्यार करते थे। अकस्मात् तुमको क्या होगया? यदि तुम ऐसे ही रूठे रहोगे तो बेचारी लड़की की जान पर बन जायेगी। सूखकर काँटा हो गयी है। ईश्वर हीजानता है, मुझे उसे देखकर करुणा उत्पन्न होती है। तुम्हारी चर्चा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती।


प्रताप आँखें किये हुए सब सुनता और चुपचाप सरक जाता। प्रताप अब भोला बालक नहीं था। उसके जीवनरूपीवृक्ष में यौवनरूपी कोपलें फूट रही थी। उसने बहुत दिनों से-उसी समय से जब से उसने होश संभाला-विरजन केजीवन को अपने जीवन में शर्करा में क्षीर की भॉति मिला लिया था। उन मनोहर और सुहावने स्वप्नों का इसकठोरता और निर्दयता से धूल में मिलाया जाना उसके कोमल हृदय को विदीर्ण करने के लिए काफी था, वह जोअपने विचारों में विरजन को अपना सर्वस्व समझता था, कहीं का रहा, और वह, जिसने विरजन को एक पल केलिए भी अपने ध्यान में स्थान दिया था, उसका सर्वस्व हो गया। इस विर्तक से उसके हृदय में व्याकुलता उत्पन्नहोती थी और जी चाहता था कि जिन लोगों ने मेरी स्वप्नवत् भावनाओं का नाश किया है और मेरे जीवन कीआशाओं को मिटटी में मिलाया है, उन्हें मैं भी जलाऊँ सबसे अधिक क्रोध उसे जिस पर आता था वह बेचारीसुशीला थी।


शनै:-शनै: उसकी यह दशा हो गई कि जब स्कूल से आता तो कमलाचरण के सम्बन्ध की कोई घटना अवश्य वर्णनकरता। विशेष कर उस समय जब सुशीला भी बैठी रहती। उस बेचारी का मन दुखाने में इसे बडा ही आनन्द आता।यद्यपि अव्यक्त रीति से उसका कथन और वाक्य-गति ऐसी हृदय-भेदिनी होती थी कि सुशीला के कलेजे में तीर कीभाँति लगती थी। आज महाशय कमलाचरण तिपाई के ऊपर खड़े थे, मस्तक गगन का स्पर्श करता था। परन्तुनिर्लज्ज इतने बड़े कि जब मैंने उनकी ओर संकेत किया तो खड़े-खड़े हँसने लगे आज बडा तमाशा हुआ। कमलाने एक लड़के की घड़ी उड़ा दी। उसने मास्टर से शिकायत की। उसके समीप वे ही महाशय बैठे हुए थे। मास्टर नेखोज की तो आप ही फेंटे से घडी मिली। फिर क्या था ? बडे मास्टर के यहाँ रिपोर्ट हुई। वह सुनते ही झ्ल्ला गये औरकोई तीन दर्जन बेंतें लगायीं, सड़ासड़। सारा स्कूल यह कौतूहल देख रहा था। जब तक बेंतें पड़ा की, महाशयचिल्लाया किये, परन्तु बाहर निकलते ही खिलखिलाने लगे और मूँछों पर ताव देने लगे। चाची। नहीं सुना ? आजलडको ने ठीक सकूल के फाटक पर कमलाचरण को पीटा। मारते-मारते बेसुध कर दिया। सुशीला ये बातें सुनतीऔर सुन-सुसनकर कुढती। हाँ, प्रताप ऐसी कोई बात विरजन के सामने करता। यदि वह घर में बैठी भी होती तोजब तक चली जाती, यह चर्चा छेडता। वह चाहता था कि मेरी बात से इसे कुछ दुख: हो।


समय-समय पर मुंशी संजीवनलाल ने भी कई बार प्रताप की कथाओं की पुष्टि की। कभी कमला हाट में बुलबुललड़ाते मिल जाता, कभी गुण्डों के संग सिगरेट पीते, पान चबाते, बेढंगेपन से घूमता हुआ दिखायी देता। मुंशीजीजब जामाता की यह दशा देखते तो घर आते ही स्त्री पर क्रोध निकालते- यह सब तुम्हारी ही करतूत है। तुम्ही नेकहा था घर-वर दोनों अच्छे हैं, तुम्हीं रीझी हुई थीं। उन्हें उस क्षण यह विचार होता कि जो दोषारोपण सुशील परहै, कम-से-कम मुझ पर ही उतना ही है। वह बेचारी तो घर में बन्द रहती थी, उसे क्या ज्ञात था कि लडका कैसा है।वह सामुद्रिक विद्या थोड़े ही पढी थी ? उसके माता-पिता को सभ्य देखा, उनकी कुलीनता और वैभव पर सहमत होगयी। पर मुंशीजी ने तो अकर्मण्यता और आलस्य के कारण छान-बीन की, यद्यपि उन्हें इसके अनेक अवसरप्राप्त थे, और मुंशीजी के अगणित बाँधव इसी भारतवर्ष में अब भी विद्यमान हैं जो अपनी प्यारी कन्याओं को इसीप्रकार नेत्र बन्द करके कुएँ में ढकेल दिया करते हैं।


सुशीला के लिए विरजन से प्रिय जगत् में अन्य वस्तु थी। विरजन उसका प्राण थी, विरजन उसका धर्म थी औरविरजन ही उसका सत्य थी। वही उसकी प्राणाधार थी, वही उसके नयनों की ज्योति और हृदय का उत्साह थी, उसकी सर्वौच्च सांसारिक अभिलाषा यह थी कि मेरी प्यारी विरजन अच्छे घर जाए। उसके सास-ससुर, देवी-देवताहों। उसके पति शिष्टता की मूर्ति और श्रीरामचंद्र की भांति सुशील हों। उस पर कष्ट की छाया भी पडे। उसनेमर-मरकर बड़ी मिन्नतों से यह पुत्री पायी थी और उसकी इच्छा थी कि इन रसीले नयनों वाली, अपनी भोली-भालीबाला को अपने मरण-पर्यन्त आंखों से अदृश्य होने दूँगी। अपने जामाता को भी यहीं बुलाकर अपने घर रखूँगी।जामाता मुझे माता कहेगा, मैं उसे लड़का समझूँगी। जिस हृदय में ऐसे मनोरथ हों, उस पर ऐसी दारुण औरहृदयविदारणी बातों का जो कुछ प्रभाव पड़ेगा, प्रकट है।


हा! हन्त! दीना सुशीला के सारे मनोरथ मिट्टी में मिल गये। उसकी सारी आशाओं पर ओस पड़ गयी। क्या सोचतीथी और क्या हो गया। अपने मन को बार-बार समझाती कि अभी क्या है, जब कमला सयानी हो जाएगी तो सबबुराइयाँ स्वयं त्याग देगा पर एक निन्दा का घाव भरने नहीं पाता था कि फिर कोई नवीन घटना सुनने में जाती। इसी प्रकार आघात-पर-आघात पडते गये। हाय! नहीं मालूम विरजन के भाग्य में क्या बदा है ? क्या यहगुण की मूर्ति, मेरे घर की दीप्ति, मेरे शरीर का प्राण इसी दुष्कृत मनुष्य के संग जीवन व्यतीत करेगी ? क्या मेरीश्यामा इसी गिद्ध के पाले पड़ेगी ? यह सोचकर सुशीला रोने लगती और घंटों रोती रहती है। पहिले विरजन कोकभी-कभी डांट - डपट भी दिया करती थी, अब भूलकर भी कोई बात कहती। उसका मुँह देखते ही उसे याद जाती। एक क्षण के लिए भा उसे सामने से अदृश्य होने देगी। यदि जरा देर के लिए वह सुवामा के घर चली जाती, तो स्वयं पहुँच जाती उसे ऐसा प्रतीत होता मानों कोई उसे छीनकर ले भागता है। जिस प्रकार वधिक की छुरी केतले अपने बछड़े को देखकर गाय का रोम-रोम काँपने लगता है, उसी प्रकार विरजन के दुख का ध्यान करकेसुशीला की आँखों में संसार सूना जाना पड़ता था। इन दिनों विरजन को पल-भर के लिए नेत्रों से दूर करते उसे वहकष्ट और व्याकुलता होती,जो चिड़िया को घोंसले से बच्चे के खो जाने पर होती है।


सुशीला एक तो यों ही जीर्ण रोगिणी थी। उस पर
भविष्य की असाध्य चिन्ता और जलन ने उसे और भी घुला डाला।निन्दाओं ने कलेजा छलनी कर दिया। : मास भी बीतने पाये थे कि क्षयरोग के चिह्न दिखायी दिए। प्रथम तोकुछ दिनों तक साहस करके अपने दु: को छिपाती रही, परन्तु कब तक ? रोग बढने लगा और वह शक्तिहीन होगयी। चारपाई से उठना कठिन हो गया। वैद्य और डाक्टर औषधि करने लगे। विरजन और सुवामा दोनों रात-दिनउसके पांस बैठी रहतीं विरजन एक पल के लिए उसकी दृष्टि से ओझल होती। उसे अपने निकट देखकरसुशीला बेसुध-सी हो जाती और फूट-फूटकर रोने लगती। मुंशी संजीवनलाल पहले तो धैर्य के साथ दवा करते रहे, पर जब देखा कि किसी उपाय से कुछ लाभ नहीं होता और बीमारी की दशा दिन-दिन निकृष्ट होती जाती है तो अंतमें उन्होंने भी निराश हो उद्योग और साहस कम कर दिया। आज से कई साल पहले जब सुवामा बीमार पड़ी थी तबसुशीला ने उसकी सेवा-शुश्रूषा में पूर्ण परिश्रम किया था,अब सुवामा की बारी आयी। उसने पड़ोसी और भगिनी केधर्म का पालन भली-भांति किया। रुग्ण-सेवा में अपने गृहकार्य को भूल-सी गई। दो-दो तीन-तीन दिन तक प्रतापसे बोलने की नौबत आती बहुधा वह बिना भोजन किये ही स्कूल चला जाता। परन्तु कभी कोई अप्रिय शब्दमुख से निकालता। सुशीला की रुग्णावस्था ने अब उसकी द्वेषाग्नि को बहुत कम कर दिया था। द्वेष की अग्निद्वेष्टा की उन्नति और दुर्दशा के साथ-साथ तीव्र और प्रज्जवलित हो जाती है और उसी समय शान्त होती है जब द्वेष्टाके जीवन का दीपक बुझ जाता है।


जिस दिन वृजरानी को ज्ञात हो जाता कि आज प्रताप बिना भोजन किये स्कूल जा रहा है, उस दिन वह कामछोड़कर उसके घर दौड़ जाती और भोजन करने के लिए आग्रह करती, पर प्रताप उससे बात करता, उसे रोताछोड़ बाहर चला जाता। निस्संसदेह वह विरजन को पूर्णत: निर्दोष समझता था, परन्तु एक ऐसे संबध को, जो वर्ष: मास में टूट जाने वाला हो, वह पहले ही से तोड़ देना चाहता था। एकान्त में बैठकर वह आप-ही-आपफूट-फूटकर रोता, परन्तु प्रेम के उद्वेग को अधिकार से बाहर होने देता।


एक दिन वह स्कूल से आकर अपने कमरे में बैठा हुआ था कि विरजन आयी। उसके कपोल अश्रु से भीगे हुए थे औरवह लंबी-लंबी सिसकियाँ ले रही थी। उसके मुख पर इस समय कुछ ऐसी निराशा छाई हुई थी और उसकी दृष्टि कुछऐसी करुणोत्पादक थी कि प्रताप से रहा गया। सजल नयन होकर बोला-‘क्यों विरजन। रो क्यों रही हो ? विरजनने कुछ उतर दिया, वरन और बिलख-बिलखकर रोने लगी। प्रताप का गाम्भीर्य जाता रहा। वह निस्संकोच होकरउठा और विरजन की आँखों से आँसू पोंछने लगा। विरजन ने स्वर संभालकर कहा- लल्लू अब माताजी जीयेंगी, मैं क्या करुँ ? यह कहते-कहते फिर सिसकियाँ उभरने लगी।


प्रताप यह समाचार सुनकर स्तब्ध हो गया। दौड़ा हुआ विरजन के घर गया और सुशीला की चारपाई के समीप खड़ाहोकर रोने लगा। हमारा अन्त समय कैसा धन्य होता है। वह हमारे पास ऐसे-ऐसे अहितकारियों को खींच लाता है, जो कुछ दिन पूर्व हमारा मुख नहीं देखना चाहते थे, और जिन्हें इस शक्ति के अतिरिक्त संसार की कोई अन्य शक्तिपराजित कर सकती थी। हाँ यह समय ऐसा ही बलवान है और बडे-बडे बलवान शत्रुओं को हमारे अधीन कर देताहै। जिन पर हम कभी विजय प्राप्त कर सकते थे, उन पर हमको यह समय विजयी बना देता है। जिन पर हमकिसी शत्रु से अधिकार पा सकते थे उन पर समय और शरीर के शक्तिहीन हो जाने पर भी हमको विजयी बनादेता है। आज पूरे वर्ष भर पश्चात प्रताप ने इस घर में पर्दापण किया। सुशीला की आँखें बन्द थीं , पर मुखमण्डलऐसा विकसित था, जैसे प्रभातकाल का कमल। आज भोर ही से वह रट लगाये हुए थी कि लल्लू को दिखा दो।सुवामा ने इसीलिए विरजन को भेजा था।


सुवामा ने कहा- बहिन। आँखें खोलो लल्लू खड़ा है।

सुशीला ने आँखें खोल दीं और दोनों हाथ प्रेम-बाहुल्य से फैला दिये। प्रताप के हृदय से विरोध का अन्तिम चिह्न भीविलीन हो गया। यदि ऐसे काल में भी कोई मत्सर का मैल रहने दे, तो वह मनुष्य कहलाने का हकदार नहीं है।प्रताप सच्चे पुत्रत्व-भाव से आगे बढ़ा और सुशीला के प्रेमांक में जा लिपटा। दोनों आधे घंटे तक रोते रहे। सुशीलाउसे अपने दोनों बाँहों में इस प्रकार दबाये हुए थी मानों वह कहीं भागा जा रहा है। वह इस समय अपने को सैंकडोंधिक्कार दे रहा था कि मैं ही इस दुखिया का प्राणहारी हूँ मैने ही द्वेष-दुरावेग के वशीभूत होकर इसे इस गति कोपहुँचाया है। मैं ही इस प्रेम की मूर्ति का नाशक हूँ ज्यों-ज्यों यह भावना उसके मन में उठती, उसकी आंखों से आँसूबहते। नादान सुशीला बोली- लल्लू। अब मैं दो-एक दिन की ओर मेहमान हूँ। मेरा जो कुछ कहा-सुना हो, क्षमाकरो।


प्रताप का स्वर उसके वश में था, इसलिए उसने कुछ उतर दिया।

सुशीला फिर बोली- जाने क्यों तुम मुझसे रुष्ट हो। तुम हमारे घर नही आते। हमसे बोलते नहीं। जी तुम्हें प्यारकरने को तरस-तरसकर रह जाता है। पर तुम मेरी तनिक भी सुधि नहीं लेते। बताओ अपनी दुखिया चाची से क्योंरूष्ट हो ? ईश्वर जानता है, मैं तुमको सदा अपना लड़का समझती रही। तुम्हें देखकर मेरी छाती फूल उठती थी। यहकहते-कहते निर्बलता के कारण उसकी बोली धीमी हो गयी, जैसे क्षितिज के अथाह विस्तार में उड़नेवाले पक्षी कीबोली प्रतिक्षण मध्यम होती जाती है-यहाँ तक कि उसके शब्द का ध्यानमात्र शेष रह जाता है। इसी प्रकार सुशीलाकी बोली धीमी होते-होते केवल साँय-साँय रह गई




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