Subscribe

RSS Feed (xml)

"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Wednesday, November 19, 2008

विदुषी वृजरानी - मुंशी प्रेमचंद

विदुषी वृजरानी
- मुंशी प्रेमचंद


जब से मुंशी संजीवनलाल तीर्थ यात्रा को निकले और प्रतापचन्द्र प्रयाग चला गया उस समय से सुवामा के जीवन मेंबड़ा अन्तर हो गया था। वह ठेके के कार्य को उन्नत करने लगी। मुंशी संजीवनलाल के समय में भी व्यापार मेंइतनी उन्नति नहीं हुई थी। सुवामा रात-रात भर बैठी ईंट-पत्थरों से माथा लड़ाया करती और गारे-चूने की चिंता मेंव्याकुल रहती। पाई-पाई का हिसाब समझती और कभी-कभी स्वयं कुलियों के कार्य की देखभाल करती। इन कार्योंमें उसकी ऐसी प्रवृति हुई कि दान और व्रत से भी वह पहले का-सा प्रेम रहा। प्रतिदिन आय वृद्वि होने पर भीसुवामा ने व्यय किसी प्रकार का बढ़ाया। कौड़ी-कौड़ी दाँतो से पकड़ती और यह सब इसलिए कि प्रतापचन्द्रधनवान हो जाए और अपने जीवन-पर्यन्त सानंद रहे।

सुवामा को अपने होनहार पुत्र पर अभिमान था। उसके जीवन की गति देखकर उसे विश्वास हो गया था कि मन मेंजो अभिलाषा रखकर मैंने पुत्र माँगा था, वह अवश्य पूर्ण होगी। वह कालेज के प्रिंसिपल और प्रोफेसरों से प्रताप कासमाचार गुप्त रीति से लिया करती थी और उनकी सूचनाओं का अध्ययन उसके लिए एक रसेचक कहानी के तुल्यथा। ऐसी दशा में प्रयाग से प्रतापचन्द्र को लोप हो जाने का तार पहुँचा मानों उसके हुदय पर वज्र का गिरना था।सुवामा एक ठण्डी साँसे ले, मस्तक पर हाथ रख बैठ गयी। तीसरे दिन प्रतापचन्द्र की पुस्तकें, कपड़े और सामग्रियाँभी पहुँची, यह घाव पर नमक का छिड़काव था।

प्रेमवती के मरे का समाचार पाते ही प्राणनाथ पटना से और राधाचरण नैनीताल से चले। उसके जीते-जी आते तोभेंट हो जाती, मरने पर आये तो उसके शव को भी देखने को सौभाग्य हुआ। मृतक-संस्कार बड़ी धूम से कियागया। दो सप्ताह गाँव में बड़ी धूम-धाम रही। तत्पश्चात् मुरादाबाद चले गये और प्राणनाथ ने पटना जाने की तैयारीप्रारम्भ कर दी। उनकी इच्छा थी कि स्त्री को प्रयाग पहुँचाते हुए पटना जाएँ पर सेवती ने हठ किया कि जब यहाँतक आये हैं, तो विरजन के पास भी अवश्य चलना चाहिए नहीं तो उसे बड़ा दु: होगा। समझेगी कि मुझे असहायजानकर इन लोगों ने भी त्याग दिया।

सेवती का इस उचाट भवन मे आना मानो पुष्पों में सुगन्ध में आना था। सप्ताह भर के लिए सुदिन का शुभागमन होगया। विरजन बहुत प्रसन्न हुई और खूब रोयी। माधवी ने मुन्नू को अंक में लेकर बहुत प्यार किया।


प्रेमवती के चले जाने पर विरजन उस गृह में अकेली रह गई थी। केवल माधवी उसके पास थी। हृदय-ताप औरमानसिक दु: ने उसका वह गुण प्रकट कर दिया, जो अब तक गुप्त था। वह काव्य और पद्य-रचना का अभ्यासकरने लगी। कविता सच्ची भावनाओं का चित्र है और सच्ची भावनाएँ चाहे वे दु: हों या सुख की, उसी समयसम्पन्न होती हैं जब हम दु: या सुख का अनुभव करते हैं। विरजन इन दिनों रात-रात बैठी भाषा में अपनेमनोभावों के मोतियों की माला गूँथा करती। उसका एक-एक शब्द करुणा और वैराग्य से परिपूर्ण होता था| अन्यकवियों के मनों में मित्रों की वाह -वाह और काव्य-प्रेमियों के साधुवाद से उत्साह पैदा होता है, पर विरजन अपनीदु: कथा अपने ही मन को सुनाती थी।


सेवती को आये दो- तीन दिन बीते थे। एक दिन विरजन से कहा- मैं तुम्हें बहुधा किसी ध्यान में मग्न देखती हूँऔर कुछ लिखते भी पाती हूँ। मुझे बताओगी? विरजन लज्जित हो गयी। बहाना करने लगी कि कुछ नहीं, यों हीजी कुछ उदास रहता है। सेवती ने कहा-मैं मानूँगी। फिर वह विरजन का बाक्स उठा लायी, जिसमें कविता केदिव्य मोती रखे हुए थे। विवश होकर विरजन ने अपने नय पद्य सुनाने शुरु किये। मुख से प्रथम पद्य का निकलनाथा कि सेवती के रोएँ खड़े हो गये और जब तक सारा पद्य समाप्त हुआ, वह तन्मय होकर सुनती रही। प्राणनाथकी संगति ने उसे काव्य का रसिक बना दिया था। बार-बार उसके नेत्र भर आते। जब विरजन चुप हो गयी तो एकसमाँ बँधा हुआ था मानों को कोई मनोहर राग अभी थम गया है। सेवती ने विरजन को कण्ठ से लिपटा लिया, फिरउसे छोड़कर दौड़ी हुई प्राणनाथ के पास गयी, जैसे कोई नया बच्चा नया खिलौना पाकर हर्ष से दौड़ता हुआ अपनेसाथियों को दिखाने जाता है। प्राणनाथ अपने अफसर को प्रार्थना-पत्र लिख रहे थे कि मेरी माता अति पीड़िता होगयी है, अतएव सेवा में प्रस्तुत होने में विलम्ब हुआ। आशा करता हूँ कि एक सप्ताह का आकस्मिक अवकाश प्रदानकिया जायगा। सेवती को देखकर चट अपना प्रार्थना -पत्र छिपा लिया और मुस्कराये। मनुष्य कैसा धूर्त है! वहअपने आपको भी धोखा देने से नहीं चूकता।

सेवती- तनिक भीतर चलो, तुम्हें विरजन की कविता सुनवाऊँ, फड़क उठोगे।

प्राण0- अच्छा, अब उन्हें कविता की चाट हुई है? उनकी भाभी तो गाया करती थीतुम तो श्याम बड़े बेखबर हो।
सेवती- तनिक चलकर सुनो, तो पीछे हँसना मुझे तो उसकी कविता पर आश्चर्य हो रहा है।
प्राण0- चलो, एक पत्र लिखकर अभी आता हूँ।
सेवती- अब यही मुझे अच्छा नहीं लगता। मैं आपके पत्र नोच डालूँगी

सेवती प्राणनाथ को घसीट ले आयी। वे अभी तक यही जानते थे कि विरजन ने कोई सामान्य भजन बनाया होगा।उसी को सुनाने के लिए व्याकुल हो रही होगी। पर जब भीतर आकर बैठे और विरजन ने लजाते हुए अपनी भावपूर्णकविताप्रेम की मतवालीपढ़नी आरम्भ की तो महाशय के नेत्र खुल गये। पद्य क्या था, हृदय के दुख की एक धाराऔर प्रेमरहस्य की एक कथा थी। वह सुनते थे और मुग्ध होकर झुमते थे। शब्दों की एक-एक योजना पर, भावोंके एक-एक उदगार पर लहालोट हुए जाते थे। उन्होंने बहुतेरे कवियों के काव्य देखे थे, पर यह उच्च विचार, यहनूतनता, यह भावोत्कर्ष कहीं दीख पड़ा था। वह समय चित्रित हो रहा था जब अरुणोदय के पूर्व मलयानिललहराता हुआ चलता है, कलियाँ विकसित होती हैं, फूल महकते हैं और आकाश पर हल्की लालिमा छा जाती है।एकएक शब्द में नवविकसित पुष्पों की शोभा और हिमकिरणों की शीतलता विद्यमान थी। उस पर विरजन कासुरीलापन और ध्वनि की मधुरता सोने में सुगन्ध थी। ये छन्द थे, जिन पर विरजन ने हृदय को दीपक की भॉँतिजलाया था। प्राणनाथ प्रहसन के उद्देश्य से आये थे। पर जब वे उठे तो वस्तुत: ऐसा प्रतीत होता था, मानो छाती सेहृदय निकल गया है। एक दिन उन्होंने विरजन से कहा- यदि तुम्हारी कविताएँ छपें , तो उनका बहुत आदर हो।

विरजन ने सिर नीचा करके कहा- मुझे विश्वास नहीं कि कोई इनको पसन्द करेगा।

प्राणनाथ- ऐसा संभव ही नहीं। यदि हृदयों में कुछ भी रसिकता है तो तुम्हारे काव्य की अवश्य प्रतिष्ठा होगी। यदिऐसे लोग विद्यमान हैं, जो पुष्पों की सुगन्ध से आनन्दित हो जाते हैं, जो पक्षियों के कलरव और चाँदनी कीमनोहारिणी छटा का आनन्द उठा सकते हैं, तो वे तुम्हारी कविता को अवश्य हृदय में स्थान देंगे। विरजन के ह्दयमे वह गुदगुदी उत्पन्न हुई जो प्रत्येक कवि को अपने काव्यचिन्तन की प्रशंसा मिलने पर, कविता के मुद्रित होनेके विचार से होती है। यद्यपि वह नहींनहीं करती रही, पर वह, ‘नहीं’, ‘हाँके समान थी। प्रयाग से उन दिनोंकमलानाम की अच्छी पत्रिका निकलती थी। प्राणनाथ नेप्रेम की मतवालीको वहाँ भेज दिया। सम्पादक एककाव्यरसिक महानुभाव थे कविता पर हार्दिक धन्यवाद दिया और जब यह कविता प्रकाशित हुई,तोसाहित्यसंसार में धूम मच गयी। कदाचित ही किसी कवि को प्रथम ही बार ऐसी ख्याति मिली हो। लोग पढ़ते औरविस्मय से एक-दूसरे का मुँह ताकते थे। काव्यप्रेमियों मे कई सप्ताह तक मतवाली बाला के चर्चे रहे। किसी कोविश्वास ही आता था कि यह एक नवजात कवि की रचना है। अब प्रति मासकमलाके पृष्ठ विरजन की कवितासे सुशोभित होने लगे औरभारत महिलाको लोकमत ने कवियों के सम्मानित पद पर पहुँचा दिया भारतमहिलाका नाम बच्चे-बच्चे की जिह्वा पर चढ गया। कोई इस समाचार-पत्र या पत्रिकाभारत महिलाको ढूढनेलगते। हां, उसकी दिव्य शक्तियाँ अब किसी को विस्मय में डालतीं उसने स्वयं कविता का आदर्श उच्च कर दियाथा।

तीन वर्ष तक किसी को कुछ भी पता लगा किभारत महिलाकौन है। निदान प्राण नाथ से रहा गया। उन्हेंविरजन पर भक्ति हो गयी थी। वे कई मास से उसका जीवनचरित्र लिखने की धुन में थे। सेवती के द्वारा धीरे-धीरेउन्होनें उसका सब जीवन चरित्र ज्ञात कर दिया औरभारत महिलाके शीर्षक से एक प्रभावपूरित लेख लिया।प्राणनाथ ने पहिले लेख लिखा था, परन्तु श्रद्वा ने अभ्यास की कमी पूरी कर दी थी। लेख अत्यन्त रोचक, समालोचनात्मक और भावपूर्ण था।

इस लेख का मुद्रित होना था कि विरजन को चारों तरफ से प्रतिष्ठा के उपहार मिलने लगे। राधाचरण मुरादाबाद सेउसकी भेंट को आये। कमला, उमादेवी, कुंवर और सखिया जिन्होने उसे विस्मरण कर दिया था प्रतिदिन विरजनके दशर्नों को आने लगी। बडे बडे गणमान्य सज्जन जो ममता के अभिमान से हकीमों के सम्मुख सिर झुकाते, विरजन के द्वार पर दशर्न को आते थे। चन्द्रा स्वयं तो सकी, परन्तु पत्र में लिखा – `जी चाहता है कि तुम्हारे चरणों पर सिर रखकर घंटों रोऊँ'|



* * *


0 comments:

Post a Comment

आपका एक-एक सार्थक शब्द इस अभियान व प्रयास को बल देगा. मर्यादा व संतुलन, विवेक के पर्याय हैं और उनकी सराहना के शब्द मेरे पास नहीं हैं;पुनरपि उनका सत्कार करती हूँ|आपके प्रतिक्रिया करने के प्रति आभार व्यक्त करना मेरा नैतिक दायित्व ही नहीं अपितु प्रसन्नता का कारण भी है|पुन: स्वागत कर हर्ष होगा| आपकी प्रतिक्रियाएँ मेरे लिए महत्वपूर्ण हैं।

Related Posts with Thumbnails