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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

Monday, June 23, 2008

मेरी वेणी में सवेरे सवेरे

बेटी
(ऋषभ देव शर्मा )






जब तुम पास नहीं होती

तब मैं अकेली होती हूँ।

इसे तुम जानती हो, माँ

इसीलिए तो अपने आशीष

रोज गूँथ देती हो

मेरी वेणी में सवेरे- सवेरे॥


अपना सारा लाड़

आँज देती हो मेरी आंखों में

घर से निकलते समय।


तुम दुनिया भर में

सबसे अच्छी माँ हो,

-मेरी माँ .

Saturday, June 21, 2008

यह बच्चा किसका बच्चा है - इब्ने इंशा

यह बच्चा कैसा बच्चा है

- इब्ने इंशा

यह बच्चा कैसा बच्चा है


यह बच्चा काला-काला सा
यह काला सा मटियाला-सा
यह बच्चा भूखा-भूखा-सा
यह बच्चा सूखा-सूखा-सा
यह बच्चा किसका बच्चा है
जो रेत पे तन्हा बैठा है
न उसके पेट में रोटी है
न उसके तन पर कपड़ा है
ना उसके सिर पर टोपी है
ना उसके पैर में जूता है
ना उसके पास खिलौना है
कोई भालू है कोई घोड़ा है
ना उसका जी बहलाने को
कोई लोरी है कोई झूला है
न उसकी जेब में धेला है
ना उसके हाथ में पैसा है
ना उसके अम्मी-अब्बू हैं
ना उसकी आपा-खाला है


यह सारे जग में तन्हा है
यह बच्चा कैसा बच्चा है



यह सहरा कैसा सहरा है
न इस सहरा में बादल है
न इस सहरा में बरखा है
न इस सहरा में बोली है
न इस सहरा में खोशा है
न इस सहरा में सब्जा है
न इस सहरा में साया है


यह सहरा भूख का सहरा है
यह सहरा मौत का साया है


यह बच्चा कैसे बैठा है
यह बच्चा कब से बैठा है
यह बच्चा क्या कुछ पूछता है
यह बच्चा क्या कुछ कहता है
यह दुनिया कैसी दुनिया है
यह दुनिया किस की दुनिया है


इस दुनिया के कुछ टुकड़ों में
कहीं फूल खिले कहीं सब्जा है
कहीं बादल घिर-घिर आते हैं
कहीं चश्मा है कहीं दरिया है
कहीं ऊँचे महल अटारियां है
कहीं महफ़िल है कहीं मेला है
कहीं कपड़ों के बाजार सजे
यह रेशम है यह दीबा है
यहीं गल्ले के अम्बार लगे
सब गेहूं, धन मुहय्या है
कहीं दौलत के संदूक भरे
हां तांबा, सोना, रूपा है
तुम जो मांगो सो हाजिर है
तुम जो चाहो सो मिलता है


इस भूख के दुख की दुनिया में
यह कैसा सुख का सपना है?
यह किस धरती के टुकड़े हैं?
यह किस दुनिया का हिस्सा है?



हम जिस आदम के बेटे हैं

यह उस आदम का बेटा है
यह आदम एक ही आदम है
यह गोरा है या काला है
यह धरती एक ही धरती है
यह दुनिया एक ही दुनिया है
सब इक दाता के बंदे हैं
सब बंदों का इक दाता है
कुछ पूरब-पच्छिम फर्क नहीं
इस धरती पर हक सबका है


यह तन्हा बच्चा बेचारा
यह बच्चा जा यहां बैठा है
इस बच्चे की कहीं भूख मिटे
(क्या मुश्किल है हो सकता है)
इस बच्चे को कहीं दूध मिले
(हां दूध यहां बहुतेरा है)
इस बच्चे का कोई तन ढांके
(क्या कपड़ों का यहां तोड़ा है?)
इस बच्चे को कोई गोद में ले
(इंसान जो अब तक जिंदा है)


फ़िर देखें कैसा बच्चा है
यह कितना प्यारा बच्चा है


इस जग में सब कुछ रब का है
जो रब का है, वो सब का है
सब अपने हैं कोई गैर नहीं
हर चीज में सबका साझा है
जो बढ़ता है, जो उगता है
यह दाना है, या मेवा है
जो कपड़ा है, जो कंबल है
जो चांदी है, जो सोना है
वह सारा इस बच्चे का है
जो तेरा है, जो मेरा है


यह बच्चा किसका बच्चा है
यह बच्चा सबका बच्चा है।

Friday, June 20, 2008

बच्चे : विविध रूप

बच्चे : विविध रूप

Paintings - Jim Daly


बाल सुलभता पर मुग्ध हो कर कला के जाने कितने प्रतिमान विविध रूपों में रचे गए हैं। सूरदास की रचनाओं से लेकर 'ठुमक चलत रामचंद्र' तक के कई मनोहारी चित्र इसी प्रकार हिन्दी पट्टी वालों के मन-मस्तिष्क पर अंकित होंगे।यही स्थिति न्यूनाधिक अन्य अभिव्यक्ति माध्यमों की है।

चित्रकारों ने भी अपनी तूलिका से जाने कितनी व कैसी-कैसी सुंदर कृतियाँ रची हैं जो बाल्यकाल के सुंदर खाके खींचने में अपना सानी नहीं रखतीं.
इसी बचपन को रंगों व अपनी पेंटिंग्स में उतारने का भावुक प्रयास Jim Daly की तूलिका ने भी किया है. आज उनकी आँख से बच्चों को चित्रबद्ध देखते हैं ---




































Thursday, June 19, 2008

खलील जिब्रान


खलील जिब्रान



सीरिया देश के माउण्‍ट लेबनान प्रान्‍त के बशीरी नामक नगर में एक कवि एवं चित्रकार का जन्‍म सन् 1883 में हुआ। लोग उसे लेबनान के अमरदूत के रूप में जानते हैं। वह कवि और कोई नहीं अपितु खलील जिब्रान के नाम से आज विश्‍वविख्‍यात है। लेबनान वह प्रान्‍त है जहां यहूदियों के अनेक पैगम्‍बर पैदा हो चुके हैं। और, खलील जिब्रान की रचनायें उसे महान युगद्रष्‍टा के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं।


बारह वर्ष की उम्र में इस बालक ने पिता की उंगली पकड़ कर यूरोप की यात्रा की। लगभग दो वर्ष बाद वापस सीरिया पहुंच कर 'मदरसत-अल-हिकमत' नाम के एक प्रसिद्ध विद्यालय में इस बालक का पहला दाखिला कराया गया। विद्यार्थी जीवन के पश्‍चात् 1903 में वे अमेरिका गये और पांच वर्ष वहां रह कर फ्रांस पहुंचे। फ्रांस के नगर पेरिस में उन्‍होंने चित्रकला का अध्‍ययन किया। सन् 1912 में पुन: अमेरिका लौटकर मरणोपरान्‍त वे न्‍यूयार्क में ही रहे।


खलील जिब्रान ने सीरिया में रहकर अनेक पुस्‍तकें अरबी भाषा में लिखीं। सन् 1918 के आसपास उनका झुकाव अंग्रेजी में लेखन के प्रति हुआ। खलील जिब्रान की अपूर्व लेखनशैली और गहन विचारों ने अमेरिका, यूरोप और पूरे एशिया में जनमानस को प्रभावित किया। विश्‍व की तीस से अधिक भाषाओं में उनकी पुस्‍तकों का अनुवाद हुआ है। वे बीसवीं सदी के दांते कहे जाने लगे। अपनी पुस्‍तकों पर चित्रांकन खलील जिब्रान स्‍वयं किया करते थे। खलील जिब्रान के चित्रों का प्रदर्शन सभी देशों के प्राय: सभी मुख्‍य नगरों में हुआ। चित्रकला में उनकी तुलना अमेरिका के महान कलाकारों आगस्‍ट रोडिन और विलियम ब्‍लैक से की जाने लगी। एक बार आगस्‍ट रोडिन ने कवि जिब्रान से अपना चित्र बनवाने की इच्‍छा प्रकट की।


कवि एवं चित्रकार खलील जिब्रान यद्यपि आज इस संसार में नहीं हैं, दिनांक 10 अप्रैल 1931 को उनका देहावसान मात्र 48 वर्ष की आयु में हो गया, तथापि अपनी रचनाओं में वे सदैव अमर रहेंगे और विश्‍व को शान्ति, मनुष्‍यता और भाईचारे का संदेश सुनाते रहेंगे।
(प्रस्तुति सहयोग : आशीष दुबे )

Wednesday, June 18, 2008

काश! ये कोशिश मिटा दे अज्ञान का अंधेरा



काश! ये कोशिश मिटा दे अज्ञान का अंधेरा


धनबाद [अमित वत्स]। एक दूना दो, दो दूना चार, तीन दूना छह॥ यह पहाड़ा इन दिनों स्टेशन में गूंज रहा है। यह पहाड़ा पढ़ने वाले कोई और नहीं बल्कि स्टेशन पर जीविकोपार्जन करने वाले वे बच्चे हैं, जो कल तक स्टेशन की कुसंस्कृति में ढल चुके थे या फिर रोटी-तड़का से भूख भगाने के लिए जूता पालिश या अन्य कार्य किया करते थे। इनकी स्थिति पहले जैसे नहीं रही अब ये कुसंस्कृति को भूल काम के साथ-साथ शिक्षा से जुड़कर सपने संजोने लग गए हैं। इनके भविष्य को उज्ज्वल बनाने का बीड़ा उठाया है सर्व शिक्षा अभियान के तहत सृजन ने। कहते हैं अंधेरा अनंत है पर एक नन्हीं सी लौ अंधेरे को चीर कर रख देती है। शायद यह लौ भी अज्ञान के अंधेरे को प्रकाशवान बना दे।


सर्व शिक्षा अभियान के तहत गैर सरकारी स्वयंसेवी संस्था इनसर्च ने प्लेटफार्म पर रहने वाले बच्चों के लिए इवनिंग स्कूल सृजन खोला है। इवनिंग स्कूल प्लेटफार्म नंबर सात के निकट खोला गया है। शाम चार से साढ़े छह बजे तक चलने वाले इस स्कूल में पचास बच्चे पढ़ रहे हैं। पढ़ने वाले बच्चे पांच वर्ष से लेकर अधिकतम 16 वर्ष के हैं। ये सभी बच्चे या तो प्लेटफार्म पर जूता पालिस, चाय बेचने का काम करते हैं अथवा नशे के आदी हो चुके हैं।


शिक्षक संजय कुमार व पंकज कुमार बताते हैं कि इन्हें पढ़ाना काफी मुश्किल काम है। ये बच्चे प्रारंभ में तो दो मिनट से ज्यादा बैठ ही नहीं पाते थे। स्टेशन पर कोई एनाउंसमेंट होने अथवा भीड़ लगने पर वे भाग कर वहां चले जाते थे। लेकिन तीन महीने के अथक प्रयास के बाद स्थिति में कुछ सुधार हुआ है। नशे के आदी हो चुके बच्चों की आदत में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।


प्रारंभ में सभी बच्चों को बैठने के लिए, शरीर को कैसे साफ रखें, रोज नहाने व मुंह धोने समेत अन्य बेसिक जानकारियां दी गई। अब अधिकांश बच्चे एक से दस तक की गिनती, पहाड़ा, ए बी सी डी व अन्य चीजें जानने लगे हैं। संजय कुमार के अनुसार बच्चों ने काफी कुछ सीखा है। बच्चे ठीक चार बजे यहां पहुंच जाते हैं, यह इस स्कूल की बहुत बड़ी उपलब्धि है।


उन्होंने कहा कि बच्चे अब सपने देखने लगे हैं यही इनको आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगा। स्कूल जल्द ही सुबह 10 से दोपहर साढ़े बारह बजे, दोपहर दो बजे से शाम साढ़े चार बजे तथा शाम साढ़े चार बजे से रात सात बजे तक तीन शिफ्टों में संचालित होगा।


इन बच्चों को सुधार दिया तो मिशन पूरा
-उम्र महज आठ साल, नाम दीपक। दीपक प्रतिदिन रात में दारू पीता है। संजय कुमार बताते हैं दीपक जैसे बच्चों को सही राह पर ले आया तो उनका मिशन पूरा हो जाएगा। बस यही चाहत है कि प्लेटफार्म पर रहकर जीवन बसर करने वाले इन बच्चों के बीच शिक्षा का अलख जगा दूं।


अधिकारी बनने की तमन्ना


-14 वर्षीय अजय सुबह सात बजे से शाम चार बजे तक प्लेटफार्म पर जूते पालिश करने का काम करता है। स्कूल खुलने के बाद यह नियमित पढ़ाई कर रहा है। अजय की तमन्ना बड़ा होकर आफिसर बनने की है। नौ वर्षीय एतवारी व मिथुन चाय बेचते हैं। इन दोनों की इच्छा भी इंसपेक्टर बनने की है।
('जागरण' से साभार )

Thursday, June 12, 2008

सुन्दरता


सुन्दरता
ऋषभ देव शर्मा











मैंने फूलों को देखा खिलते हुए,

मैंने चिडियों को देखा चहकते हुए,

मैंने लहरों को देखा मचलते हुए,

मैंने बादल को देखा बरसते हुए,

मैंने किसान को देखा पसीना बहाते हुए,

मैंने लुहार को देखा लोहे सा तपते हुए

मैंने चाँद को देखा घटते-बढ़ते हुए,

मैंने सूरज को देखा चमकते हुए,

हर बार मुझे लगा,

यह दुनिया कितनी सुंदर है।

लोग इसे कुरूप क्यों बनाते हैं?
यह तो सचमुच सुंदर है!!!

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