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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

शनिवार, 20 मार्च 2010

एक कविता आज गौरैया के नाम !


घरेलू गौरैया विलुप्तप्राय है |
20 मार्च 2010 को पहली बार विश्व गौरैया दिवस World Sparrow Day मनाया जा मनाया जा रहा है |

एक कविता आज गौरैया के नाम !


गौरैया 

बेचारी गौरैया एक
बैठ गई आ कर
खम्भों के बीच पसरे
बिजली के तारों पर
सोच रही कहाँ जाऊँ, क्या करुँ
कितना और ढूँढती फिरूँ 
चिंतातुर अनमनी
सारे घर मंझा आई
घोंसला का जुगाड़
कहीं नहीं बना पाई
घर अब कहाँ रहे
धन्नी बाँस मोखले वाले
दीवारें खड़ीं सपाट
लोप हो गये कब के आले
रहती वह नहीं पेड़ पर
कभी घोंसला बना कर
झरोखों मोखलों में बसती
तिनके घास फूस जुटा कर
फालतू कतरन झाड झंखाड़
जहाँ पाती चोंच में दबाती
फुर्र से उड़ जाती
घोंसले में खोंस आती
कीड़े मकोड़े अनाज-दाने
जो कुछ पाती चबा जाती
कुछ चोंच में दबाये
चिचिहाते बच्चों के
मुँह में ठूँस आती
कभी वह गौरैया
खिड़की की चौखट
अलगनी मुंडेरों पर
आँगन में चौबारों में
कबाड़ के ढेरों पर
सदियों से चहक रही थी
नाचती कूदती झगडती
पूरे घर में बहक रही थी
बच्चे किलकारी भरते
टकटकी लगा तकते
चिरैया का सर्कस देख
रोना भी भूल जाते
वक्त ने पलटा खाया
आधुनिक इमारतों का
अनोखा जाल बिछाया
उजड़ गई गौरैया की दुनिया
फैशन ने कहर ढाया
आदमी के स्वार्थ से हार कर
पहुँच गई विलुप्ति की कगार पर
हमारी घरेलू चिरैया
बेचारी गौरैया !
सत्यनारायण शर्मा कमल

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

हिमपात : कैलिफ़ोर्निया में टाहो झील के किनारे

एक बालगीत

हिमपात 
कैलिफ़ोर्निया में टाहो झील के किनारे

शकुन्तला बहादुर





http://thestormking.com/tahoe_nuggets/Nugget_172/Nugget__172_A_April_23_Snowfall.jpg



ऊँचे पर्वत पर हम आए ।
मन में हैं खुशियाँ भर लाए।।

पाइन के हैं वृक्ष बड़े ।
सीधे हैं प्रहरी से खड़े।।

देखो झरती कैसे झर झऱ।
गिरती जाती बर्फ़ निरन्तर।।

बरस रही है सभी तरफ़।
दुग्ध-धवल सी दिखे बरफ़।।

आज हुआ कैसा हिमपात।
ढक गइ धरा, ढके तरुपात।।

ऐसा लगे शीत के भय से।
सूरज भी न निकला घर से।।

बादल की वह ओढ़ रज़ाई।
बिस्तर में छिप लेटा भाई।।

हैं मकान सब ढके बर्फ़ से।
बन्द रास्ते हुए बर्फ़ से ।।

देखो बाहर ज़रा निकलकर ।
चलो बर्फ़ में सँभल सँभल कर।।

बरफ़ थपेड़े दे गालों पर।
जूतों में गल जाए पिघलकर।।

ऊँचे कोमल बर्फ़ के गद्दे।
बिछे हुए हैं इस भू पर।।

मन करता है उन पर लोटें।
बच्चों के संग हिलमिल कर।।

बर्फ़ के लड्डू बना बना कर।
बालक खेलें खुश हो हो कर।।

मारें इक दूजे को हँस कर।
फिर भागें किलकारी भर कर।।

और कभी मन होता ऐसा।
बचपन में देखा था जैसा।।

बर्फ़ का चूरा हाथ में लेकर।
उस पर शर्बत लाल डाल कर।।

चुस्की लेकर उसको खाएँ।
घिसी बरफ़ का लुत्फ़ उठाएँ।।

दृश्य मनोरम बड़ा यहाँ है।
अपना मन खो गया यहाँ है।।

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