पेड़ कट गए, चिडियाँ गायब नहीं कबूतर मिलते
चलो प्रकृति की ओर चलें अब सब नदियों को जोडें।
मम्मी-पापा का रोल
--शिव भजन कमलेश
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गुड्डू ने अपने पापा का किया एक दिन रोल
ढीला सूट पहन कर बैठा उपन्यास को खोल
पावरदार चढ़ा कर चश्मा लगा उलटने पेज़
छोटी कुरसी में लगती गरदन से ऊँची मेज़
बैंगन बाँध बना कर जूड़ा होंठ बनाए लाल
छोटी मुन्नी उल्टा पल्लू ओढ़ लिया फिर शाल
खूंटीदार पहन कर सैण्डिल मम्मी बनी सरोज
खाली झोला ले कर आई बना क्रोध का पोज
लो जी जल्दी सब्जी लाऒ कितनी कर दी लेट
चूल्हा ठंडा हुआ जा रहा सिकुड़ रहा है पेट
इतनी जल्दी क्यों करती हो अभी बजे हैं आठ
ऐसे रौब जमाती जैसे खड़ी करोगी खाट
गुस्से में भर कर सरोज ने मारा जम कर छक्का
गिरा कान से चश्मा पा कर उपन्यास का धक्का
अलग हो गई ज़िल्द नज़र का चशमा गिर कर चूर
खत्म हो गया खेल साथ में होश हुआ काफूर
(प्रस्तुति सहयोग : योगेन्द्र मौदगिल)