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"आमंत्रण" ---- `बालसभा’ एक अभियान है जो भारतीय बच्चों के लिए नेट पर स्वस्थ सामग्री व जीवनमूल्यों की शिक्षा हिन्दी में देने के प्रति प्रतिबद्ध है.ताकि नेट पर सर्फ़िंग करती हमारी भावी पीढ़ी को अपनी संस्कृति, साहित्य व मानवीयमूल्यों की समझ भी इस संसाधन के माध्यम से प्राप्त हो व वे केवल उत्पाती खेलों व उत्तेजक सामग्री तक ही सीमित न रहें.कोई भी इस अभियान का हिस्सा बन सकता है, जो भारतीय साहित्य से सम्बन्धित सामग्री को यूनिकोड में टंकित करके ‘बालसभा’ को उपलब्ध कराए। इसमें महापुरुषों की जीवनियाँ, कथा साहित्य व हमारा क्लासिक गद्य-पद्य सम्मिलित है ( जैसे पंचतंत्र, कथा सरित्सागर, हितोपदेश इत्यादि).

बुधवार, 25 जनवरी 2012

भारतीय गणतन्त्र : राष्ट्रीय पर्व



भारतीय गणतन्त्र चिरायु हो 


इस राष्ट्रीय पर्व पर समस्त हार्दिक शुभकामनाएँ 







बुधवार, 9 नवंबर 2011

बिपिन चन्द्र पाल: "एक महान राष्ट्रवादी दिव्यद्रष्टा"

जयंती (7 नवंबर) पर विशेष 









"बिपिन चंद्र पाल "
भारत में 'क्रांतिकारी विचारों के जनक' का परिचय :


बिपिन चंद्र पाल का जन्म 7 नवंबर 1858 को वर्त्तमान बांग्लादेश के हबीबगंज जिले के पोइल नामक गाँव में एक धनी हिंदू वैष्णव परिवार में हुआ था। बिपिन चंद्र पाल को भारत में 'क्रांतिकारी विचारों का जनक' और महान स्वतंत्रता सेनानियों में से एक के रूप में जाना जाता है। वह एक महान राष्ट्रवादी दिव्यद्रष्टा थे जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता रूपी पवित्र कार्य के लिए वीरता पूर्वक संघर्ष किया। वह एक महान देशभक्त, वक्ता, पत्रकार और वीर योद्धा थे जिसने भारत की स्वतंत्रता के लिए अंतिम समय तक संघर्ष किया।



बिपिन चंद्र पाल का प्रारंभिक जीवन :

उन्होंने कलकत्ता (वर्त्तमान कोलकाता) के प्रेसीडेंसी कालेज में प्रवेश लिया लेकिन दुर्भाग्यवश वह अपनी पढाई पूरी नहीं कर सके और तब अपना कैरियर प्रधानाचार्य के रूप में शुरू किया। बाद के वर्षों में जब बिपिन कलकत्ता पब्लिक लाइब्रेरी में पुस्तकालयाध्यक्ष के रूप में काम कर रहे थे, उनका कई बड़े नेताओं जैसे, शिवनाथ शास्त्री, एस.एन.बनर्जी और बी.के.गोस्वामी से मिलना हुआ। उन लोगों से प्रभावित होकर बिपिन ने शिक्षण का क्षेत्र छोड़कर राजनीति में अपना कैरियर शुरू करने का निश्चय किया। आगे जाकर वे बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और महर्षि अरविन्द के कार्यों, दर्शन, आध्यात्मिक विचारों और देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। इन सभी राजनेताओं से अत्यधिक प्रभावित और प्रेरित होकर बिपिन ने अपने को स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित करने का निश्चय किया। वह तुलनात्मक विचारधारा का अध्ययन करने के लिए 1898 में इंगलैंड भी गए। एक वर्ष की अवधि बिताकर वह भारत आये और उस समय से उन्होंने स्थानीय लोगों को स्वराज के विचार से परिचित कराना प्रारम्भ कर दिया। एक अच्छे पत्रकार और वक्ता होने के नाते वह अपने लेखों, भाषणों, और अन्य विवरणों के द्वारा हमेशा ही देशभक्ति, मानवता और सामाजिक जागरूकता के साथ पूर्ण स्वराज की आवश्यकता के विचार को प्रसारित करते रहते थे। 1904 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बम्बई सत्र, 1905 के बंगाल विभाजन, स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन और 1923 की बंगाल की संधि में पाल ने जुझारू प्रवृत्ति और अत्यधिक साहस और उत्साह के साथ भाग लिया।

लाल लजपत राय , बाल गंगाधर (लोकमान्य) तिलक और बिपिन चन्द्र पाल


 उत्साही स्वतंत्रता सेनानी के रूप में बिपिन चंद्र पाल :

वह तीन प्रमुख देशभक्तों में से एक थे जिन्हें लाल-बाल-पाल की त्रयी के रूप में जाना जाता है। शेष दो लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक थे। वह स्वदेशी आंदोलन के प्रमुख शिल्पकारों में से एक थे। बंगाल के विभाजन के खिलाफ उनका संघर्ष अविस्मरणीय है। त्रयी के तीनों सदस्य का मानना था कि साहस, स्वयं-सहायता और आत्म-बलिदान के द्वारा ही स्वराज के विचार या पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता को पाया जा सकता है। गांधी जी के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उद्भव से पूर्व 1905 के बंगाल विभाजन के समय ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति के खिलाफ पहले लोकप्रिय जनांदोलन को शुरू करने का श्रेय इन्हीं तीनों को जाता है। इनलोगों ने ब्रिटिश शासकों तक अपना सन्देश पहुंचाने के लिए कठोर उपायों जैसे, ब्रिटिश उत्पादों का बहिष्कार, मैनचेस्टर के कारखानों में बने पश्चिमी कपड़ों को जलाना, ब्रिटिश लोगों के स्वामित्व वाले व्यापारों और उद्योगों में हड़ताल और तालाबंदी आदि उपायों की वकालत की। वंदे मातरम विद्रोह मामले में श्री अरविंद के खिलाफ गवाही देने से मना करने के कारण बिपिन चंद्र पाल को छह महीने की जेल की सजा भी हुई।


बिपिन चंद्र पाल की उग्र पत्रकारिता और वक्तृता :

एक प्रसिद्ध पत्रकार के रूप में प्रख्यात पाल ने अपने इस व्यवसाय का प्रयोग देशभक्ति की भावना और सामाजिक जागरूकता के प्रसारण में किया। उन्होंने राष्ट्रवाद और स्वराज के विचार को प्रसारित करने के लिए अनेक पत्रिकाएँ, साप्ताहिक और पुस्तकें भी प्रकाशित की। उनकी प्रमुख पुस्तकों में भारतीय राष्ट्रवाद (Indian Nationalism), राष्ट्रीयता और साम्राज्य (Nationality and Empire), स्वराज और वर्त्तमान स्थिति (Swaraj and the Present Situation), सामाजिक सुधार के आधार (The Basis of Social Reform), भारत की आत्मा (The Soul of India), हिंदुत्व का नूतन तात्पर्य और अध्ययन (The New Spirit and Studies in Hinduism) शामिल है। वह 'डेमोक्रेट', 'इंडिपेंडेंट' और कई अन्य पत्रिकाओं और समाचारपत्रों के संपादक थे। 'परिदर्शक' (1886-बंगाली साप्ताहिक), 'न्यू इंडिया' (1902-अंग्रेजी साप्ताहिक) और 'वंदे मातरम' (1906-बंगाली साप्ताहिक) एवं 'स्वराज' ये कतिपय ऐसी पत्रिकाएँ हैं जो उनके द्वारा प्रारम्भ की गईं। 



गांधी द्वारा वर्त्तमान सरकार को बिना सरकार द्वारा स्थापित करने की घोषणा और उनकी पुरोहिताई निरंकुशता को देखकर वह ऐसे पहले व्यक्ति थे जिसने गांधी या उनके 'गांधी पंथ' की आलोचना करने का साहस किया था। इसी कारण पाल ने 1920 में गांधी के असहयोग आंदोलन का भी विरोध किया। गांधी जी के प्रति उनकी आलोचना की शुरुआत गांधी जी के भारत आगमन से ही हो गई थी जो 1921 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र में भी दिखी जब पाल अपने अध्यक्षीय भाषण के दौरान गांधी जी की “तार्किक की बजाय जादुई विचारों” की आलोचना करने लगे। पाल ने स्वैच्छिक रूप से 1920 में राजनीति से संन्यास ले लिया, हालांकि राष्ट्रीय समस्याओं पर अपने विचार जीवनपर्यंत अभिव्यक्त करते रहे। स्वतन्त्र भारत के स्वप्न को अपने मन में लिए वह 20 मई 1932 को स्वर्ग सिधार गए, और इस प्रकार भारत ने अपना एक महान और जुझारू स्वतंत्रता सेनानी खो दिया। जिसे तत्कालीन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक अपूरणीय क्षति के रूप में माना जाता है।





बुधवार, 27 जुलाई 2011

सूरज एक, चन्दा एक .....तारे भये अनेक ....

एक अनेक एकता 





पंडित विनयचंद्र मौद्गिल्य द्वारा रचित इस बालगीत  (1974) को 7 मिनट की एनिमेटेड वीडियो में ढाल कर इस कला ( एनीमेशन) के भारतीय सरताज भीमसेन  ने इसे बनाया था और दूरदर्शन  पर लाखों बच्चों के बचपन की स्मृतियों में यह गुंथी है । 

 भारतीय शॉर्ट फिल्मों के इतिहास की  सर्वाधिक लोकप्रिय, सर्वाधिक डाऊनलोड की गई और सर्वाधिक देखी गई शॉर्ट फिल्म के रूप में भी इसे महत्व प्राप्त है।

आज भी इसे देखते हुए रोमांच हो आना स्वाभाविक है। 


बुधवार, 29 जून 2011

बच्चों का सम्मान



प्रकाशन विभाग
सूचना और प्रसारण मंत्रालय
भारत सरकार

देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता पुरस्कार


नई दिल्ली, मंगलवार, 28 जून



देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता-2010 के पुरस्कार दिए गए। प्रथम पुरस्कार के लिए दिल्ली के मोहम्मद साकिब खान, दूसरे पुरस्कार के लिए गुड़गाँव  की सविता और तीसरे पुरस्कार के लिए दिल्ली की ही गौरी श्रीवास्तव के निबंधों को चुना गया। अन्य 10 बच्चों को प्रोत्साहन पुरस्कार दिए गए। ये हैं- पूर्वा, प्रियम स्नेह, चारुता गुप्ता, ऋषभ गर्ग, सौहार्द डोभाल, राजा विक्रम, मो. अनस ‘राजा’, कु. उमा देवी, दुष्यंत कुमार फेकर और शुभम तिवारी


सभी विजेता बच्चों को प्रमाण पत्रों के साथ पुरस्कार राशि भी दी गई। ये पुरस्कार, कार्यक्रम में मुख्य अतिथि सलाम बालक ट्रस्ट की अध्यक्ष श्रीमती प्रवीण नायर ने दिए। तेरह विजेता बच्चों में सोनभद्र, लखीमपुर खीरी (उत्तर प्रदेश), सीवान (बिहार), दुर्ग (छत्तीसगढ़), उत्तरकाशी (उत्तराखंड), टोंक (राजस्थान), पटना (बिहार), भोपाल (मध्य प्रदेश), रांची (झारखंड) जैसे दूर शहरों के प्रतियोगी भी शामिल हैं। सूचना और प्रसारण मंत्रालय में संयुक्त सचिव (नीति एवं प्रशासन) श्री खुर्शीद अहमद गनई समारोह में विशेष अतिथि थे।



बाल दिवस के मौके पर राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली इस प्रतियोगिता में इस बार विषय रखा गया था- 'बढ़ते लोग, घटता पानी'। देश भर के करीब एक हजार स्कूली बच्चों ने इसमें भाग लिया। निबंधों का मूल्यांकन भाषा, अभिव्यक्ति और प्रस्तुति के आधार पर किया गया।



विशिष्ट अतिथि श्री गनई ने कहा कि तकनीकी विकास का पढ़ने की अभिरुचि पर बुरा असर नहीं पड़ने देना चाहिए, बल्कि तकनीक को इसे बढ़ावा देने का औजार ही बना लेना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि अब तकनीक से दूर रहने का कोई औचित्य नहीं है।


दूरदर्शन न्यूज के महानिदेशक समाचार, श्री एस एम खान भी इस अवसर पर उपस्थित थे।


कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत प्रकाशन विभाग की अपर महानिदेशक श्रीमती अरविंद मंजीत सिंह ने किया। उन्होंने बताया कि बालभारती की प्रसार संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा है। पिछले 63 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही `बाल भारती' मनोरंजक और ज्ञानवर्धक के साथ ही यह पत्रिका बच्चों और किशोरों की प्रतिभा के विकास के लिए रचनात्मक अभियान भी चलाती रहती है।। वार्षिक निबंध और नियमित चित्रकला प्रतियोगिताएँ और दूसरी गतिविधियाँ इसी अभियान का हिस्सा हैं जो बच्चों को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा देती हैं। इसमें पाठकों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। बदलते समय के साथ पत्रिका का कलेवर, प्रस्तुतीकरण भी बदला है। फिर भी पत्रिका की कीमत सिर्फ आठ रुपए है।


सूचना और प्रसारण मंत्रालय के गीत एवं नाटक प्रभाग ने इस अवसर पर बच्चों की रुचि के अनुरूप सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया।


बाल भारती पत्रिका के वरिष्ठ संपादक श्री वेदपाल ने कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन किया।


बालभारती के अलावा, हर वर्ग और और भाषा-भाषी के लिए किफायती दरों पर पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य के साथ प्रकाशन विभाग हर माह 13 भारतीय भाषाओं में कुल 18 पत्रिकाएँ छापता है। राष्ट्रीय विकास को दर्शाती 'योजना' पत्रिका 13 भाषाओं में निकलती है। इसके अलावा विभाग हिंदी और अंग्रेजी में ग्रामीण विकास की पत्रिका 'कुरुक्षेत्र', तथा हिंदी, और उर्दू में साहित्यिक पत्रिका 'आजकल’ का प्रकाशन भी करता है। रोजगार समाचार (हिंदी और उर्दू) तथा एंप्लॉयमेंट न्यूज (अंग्रेजी) इसके विशिष्ट पाक्षिक हैं जो बेहतर रोजगार चुनने और पाने में युवाओं का मार्गदर्शन करते हैं।

शनिवार, 4 सितंबर 2010

है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं




  नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

कवि श्री गोपालप्रसाद व्यास 


***



Netaji Subhash Chandra Bose 


है समय नदी की बाढ़ कि जिसमें सब बह जाया करते हैं।
है समय बड़ा तूफ़ान प्रबल पर्वत झुक जाया करते हैं ।।
अक्सर दुनियाँ के लोग समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं, इतिहास बनाया करते हैं ।।

             
             यह उसी वीर इतिहास-पुरुष की अनुपम अमर कहानी है।
             जो रक्त कणों से लिखी गई, जिसकी जयहिन्द निशानी है।।
             प्यारा सुभाष, नेता सुभाष, भारत-भू का उजियारा था ।  
             पैदा होते ही गणिकों ने जिसका भविष्य लिख डाला था।।


यह वीर चक्रवर्ती होगा, या त्यागी होगा सन्यासी।
जिसके गौरव को याद रखेंगे, युग युग तक भारतवासी।।
सो वही वीर नौकरशाही ने,पकड़ जेल में डाला था ।
पर क्रुद्ध केहरी कभी नहीं फंदे में टिकने वाला था।।


              बाँधे जाते इंसान, कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।
              काया ज़रूर बाँधी जाती, बाँधे न इरादे जाते हैं।।
           वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था, जो मौका पाकर निकल गया।
           वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल  गया।।


जिस तरह धूर्त दुर्योधन से, बचकर यदुनन्दन आए थे।
जिस तरह शिवाजी ने मुग़लों के, पहरेदार छकाए थे ।।
बस उसी तरह  यह तोड़ पींजरा, तोता-सा बेदाग़ गया। 
जनवरी माह सन् इकतालिस,मच गया शोर वह भाग गया।।


            वे कहाँ गए, वे कहाँ रहे, ये धूमिल अभी कहानी है।
            हमने तो उसकी नयी कथा, आज़ाद फ़ौज से जानी है।। 



शनिवार, 7 अगस्त 2010

प्रकाश सूर्य से पृथ्वी तक कितने समय में और कैसे पहुँचता है?

मौलिक विज्ञानलेखन 

गतांक से आगे 
प्रकाश सूर्य से पृथ्वी तक कितने समय में और कैसे पहुँचता है?
विश्वमोहन तिवारी (भू.पू. एयर वाईस मार्शल) 




प्रकाश का वेग अनंत नहीं है जैसा कि प्राचीन काल में समझा जाता था। यह सच है कि उसका वेग हमारे लिये अकल्पनीय रूप से अधिक है, सामान्य घटनाओं के लिये अनंत-सा ही है - शून्य में प्रकाश का वेग ३ लाख कि.मी. प्रति सै. है। और प्रकाश का एक गुण बहुत ही विचित्र है। यदि हम एक बहुत तीव्र राकैट में बैठ कर जा रहे हों जिसका वेग १ लाख कि.मी. प्रति सैकैण्ड है, और हम उसमें एक टार्च से प्रकाश सामने की ओर फ़ेंकें तब उस प्रकाश का वेग ४ लाख कि. मी. प्रति सैकैण्ड न होकर ३ लाख कि. मी. प्रति सैकैण्ड ही रहेगा। और यदि उस राकैट से हम प्रकाश पीछे की ओर फ़ेंकें, तब भी उसका वेग २ लाख कि.मी. प्रति सैकैण्ड न होकर वही ३ लाख कि. मी. प्रति सैकैण्ड होगा।




पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती‌ है और उसका परिपथ वृत्ताकार न होकर दीर्घवृत्तीय - अंडाकार – है। अर्थात पृथ्वी की सूर्य से दूरी वर्ष भर बदलती रहती है। (आप यह बतलाएँ कि पृथ्वी सूर्य के अधिक निकट गर्मी की ऋतु में होती‌ है या शीतऋतु में।) अतएव प्रकाश के सूर्य से पृथ्वी तक आने की अवधि भी वर्ष भर बदलती रहती है। ऐसी स्थिति में हम औसत दूरी का सहारा लेते हैं जो हमें उस अवधि का एक औसत या मानक मान देती‌ है ।



पृथ्वी की सूर्य से औसत दूरी 15 करोड कि.मी. है। खगोल की‌ बात तो छोडें, सौर मंडल में ही दूरियां इस दूरी की लाखों गुनी हो सकती हैं । अत:ऐसी‌ लम्बी दूरियों के लिये इस सूर्य -पृथ्वी की दूरी को एक 'खगोलीय इकाई' (एस्ट्रानामिकल यूनिट) ए.यू. मानकर उसे सम्मान दिया गया है। सूर्य के गुरुत्व बल की सीमा लगभग १२५,०००x १५ करोड़ कि. मी. है, अर्थात् १२५००० ए.यू है ।



१५ करोड़ की इस दूरी को तय करने में प्रकाश को ५०० सैकैंड ( ८ मिनिट ३३ सै.) लगते हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि सूर्य पृथ्वी से ५०० सै. दूरी पर है. अंतरिक्ष की और भी लम्बी दूरियों को दर्शाने के लिए हम 'प्रकाश वर्ष' की इकाई का उपयोग करते हैं, जो वह दूरी है जो प्रकाश ३ लाख कि.मी. प्रति सै. के वेग से एक वर्ष में तय करता है!! मोटे तौर पर, १ प्रकाश वर्ष ९ लाख करोड़ कि.मी. के बराबर होता है। सौर मंडल का निकटतम तारा प्राक्सिमा सैंटारी है जो ४.२ प्रकाश वर्ष की दूरी पर है।




यह ५०० सै. की दूरी प्रकाश की तरंग शून्य में से संचरण कर आती है. यद्यपि प्रकाश एक तरंग है, उसे किसी माध्यम की आवश्यकता नहीं. वैसे प्रकाशकणों, जिऩ्हें फ़ोटान कहते हैं, का प्रवाह भी है। वह तरंग तथा कण दोनों है।



यह कैसे हो सकता है?

क्रमशः

शुक्रवार, 30 जुलाई 2010

आसमान में कितने तारे?










मौलिक विज्ञान लेखन 




आसमान में कितने तारे ?
विश्वमोहन तिवारी


प्राक्कथन


आज का युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी का है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा देश विश्व में सम्मान से रहे और समृद्ध रहे तब हमें विज्ञान (इसमें प्रौद्योगिकी सम्मिलित है) में दक्षता प्राप्त करनी ही होगी। और यदि हम सचमुच में वैज्ञानिक सोच समझ पैदा करना चाहते हैं तब यह शिक्षा विकसित मातृभाषा में होना चाहिये ।

यह हमें आज के पेचीदे जीवन को समझने में भी मदद करेगी, ताकि विज्ञान और प्रौद्योगिकी हमारे नियंत्रण में रहें, न कि हमें गुलाम बनाएँ।

आकाश के तारों को देखकर हम सभी का मन अचम्भित होता है, आह्लादित होता है और प्रश्न करता है।

विज्ञान की एक परिभाषा प्राकृतिक घटनाओं पर क्या, क्यों, कैसे, कहाँ, कब प्रश्नों के उत्तर है। कभी आपने गौर किया है कि बच्चे ऐसी ही शैली में प्रश्न करते हैं। अर्थात् वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है। इस लेखमाला में खगोल विषय पर कुछ ऐसे ही प्रश्नों के उत्तर हैं, और कुछ प्रश्न भी।


विश्व मोहन तिवारी
एयर वाइस मार्शल (से. नि.)



एक सत्य घटना :


सन १९७२ या ७३ की‌ बात है। पटना में दो दिन में दो बार भूकम्प आया था, और दूसरे भूकम्प की रात में आने की चेतावनी दी गई थी। बड़ों की बातें सुनने के बाद कोई ५ या ६ वर्ष के बालक ने अपनी माँ से कहा, "माँ जब भूकम्प आएगा, तब मुझे जगा देना।” जब माँ ने पूछा क्यों, तब उसने कहा, “ जब भूकम्प आएगा, तब बहुत सारे तारे भी टूटकर गिरेंगे। मैं उऩ्हें बटोर लूँगा।"

. . . . . . . . . . 


आसमान में कितने तारे



अकबर ने बीरबल से भी यही प्रश्न पूछा था। बीरबल ने समय माँगा और नाटक करने के बाद कोई बहुत बड़ी संख्या बतला दी। अकबर ने कहा कि वे तारे गिनवाएँगे, और उत्तरों की संख्या में अन्तर मिला तो बीरबल की खैर नहीं। बीरबल ने अपनी शैली में उत्तर दिया, “हुज़ूर, कुछ अंतर तो आ सकता है क्योंकि रोजाना अनेक तारे टूटते हैं। और हुज़ूर चाहें तो गिनती करवा सकते हैं।" अकबर बीरबल के इस उत्तर से खुश हो गए।



आज कोई भी ऐसे उत्तर से संतुष्ट नहीं होगा। क्योंकि यह वैज्ञानिक युग है। कोई भी कथन या परिकल्पना या निष्कर्ष या सिद्धान्त तब तक वैज्ञानिक नहीं माना जा सकता जबतक उसे जाँचने परखने की संभावना न हो । बीरबल को मालूम था कि उनके उत्तर को जाँचा या परखा नहीं जा सकता था, और वास्तव में यही उनका संदेश था।



विश्वसनीयता के लिये उत्तर वैज्ञानिक पद्धति से निकालना आवश्यक होता है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर निकालने के लिये अवलोकन करना आवश्यक है, और तत्पश्चात अनुमान करना पड़ता है, क्योंकि खरबों तारों की गिनती बदलते वातावरण में तो असंभव है। वैज्ञानिक पद्धति में अनुमानों का उपयोग किया जाता है। अनुमान करने का भी वैज्ञानिक आधार होना चाहिये । फ़िर अनेक वैज्ञानिक स्वतंत्र रूप से वही कार्य करते हैं और जब सभी वैज्ञानिकों के उत्तर लगभग एक से मिलते हैं तब वह अनुमान विश्वसनीय होता है, और साथ ही उस अनुमान को कभी भी चुनौती के लिये तैयार रहना होता है। हम वैज्ञानिकों से यही अपेक्षा करते हैं और इसलिये उन पर विश्वास करते हैं।



जितने तारे हमें दिखते हैं, क्या आकाश में उतने ही तारे हैं? एक तो हमारा आँखों से देखना हुआ, और दूसरा, दूरदर्शियों की सहायता से देखना। और तीसरा, गणित के नियमों से 'देखना', जैसे नैप्टियून को पहले गणितज्ञों ने 'देखा' था; ऐसे देखने को भी अनुमान कहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐसे स्थान से जहाँ अमावस्या की रात्रि में कोई शहरी उजाला न हो, निर्मल आकाश में स्वस्थ्य आँखों से हमें लगभग ३००० तारे दिखते हैं। दूरदर्शियों से दिखने वाले तारों की संख्या दूरदर्शी की शक्ति के अनुसार बढ़ती जाती है। क्या तारों की संख्या अनंत है? यदि ब्रह्माण्ड अनंत है तब भी सितारों की संख्या अनंत नहीं हो सकती, क्योंकि तब अनंत द्रव्य या ऊर्जा की आवश्यकता होगी। महान विस्फ़ोट के समय अनंत द्रव्य या ऊर्जा नहीं थी। वैसे, ब्रह्माण्ड भी अनंत नहीं हो सकता क्योंकि उसका तो प्रसार हो रहा है और उसका अभ्युदय एक निश्चित समय पहले हुआ था। हम कह सकते हैं कि उसकी त्रिज्या लगभग १३.५ प्रकाश वर्ष है।


मोटे तौर पर हमारी मंदाकिनी (गैलैक्सी) आकाश गंगा (मिल्की वे) में लगभग २०० अरब तारे हैं। अभी ताजे समाचारों के आधार पर आकाश गंगा में ४०० अरब तारे हैं। देखिये, वैज्ञानिकों के लिये भी कितना कठिन है विश्वसनीय अनुमान लगाना। किन्तु वैज्ञानिक हमेशा तैयार रहते हैं परखने के लिये और अपने विचार या निष्कर्ष बदलने के लिये । और हमारी पड़ोसन एन्ड्रोमिडा में‌ १००० अरब तारे हैं। अभी तक हब्बल जैसे संवेदनशील दूरदर्शी(टैलैस्कोप)से लगभग ५० अरब मंदाकिनियाँ देख सकते हैं। अब आप स्वयं अनुमान लगा सकते हैं कि आसमान में कितने तारे हैं !


क्रमशः 


रविवार, 13 जून 2010

हम बच्चे मज़दूर के











चन्दा मामा दूर के

-डॉ० अश्वघोष 




चन्दा मामा दूर के

छिप-छिप कर खाते हैं हमसे

लड्डू मोती चूर के




लम्बी-मोटी मूँछें ऍंठे

सोने की कुर्सी पर बैठे

धूल-धूसरित लगते उनको

हम बच्चे मज़दूर के

चन्दा मामा दूर के।





बातें करते लम्बी-चौड़ी

कभी न देते फूटी कौड़ी

डाँट पिलाते रहते अक्सर

हमको बिना कसूर के

चन्दा मामा दूर के। 



मोटा पेट सेठ का बाना

खा जाते हम सबका खाना

फुटपाथों पर हमें सुलाकर

तकते रहते घूर के

चन्दा मामा दूर के। 


मंगलवार, 18 मई 2010

नीलमघाटी


नीलमघाटी 


इस पर्वत के पार एक नीलमवाली घाटी है ,
परियाँ आतीं रोज जहाँ पर संध्या और सकारे !


*
आज चलो इस कोलाहल से दूर प्रकृति से मिलने
वन- फूलों के साथ खेलने और खुशी से खिलने
स्वच्छ वायु ,निर्मल जलधारा .हरे-भरे फूले वन ,
कलरव करते रंगरंग के पक्षी रूप सँवारे !


*
पशु-पक्षी ये जीव हमारी दुनिया के सहभागी ,
जो अधिकार हमें धरती पर वैसा ही उनका भी
बुद्धि मिली है सबके लिये विचार करें अपना सा
एक शर्त बस-जो भी आये मन में आदर धारे


*
परियाँ वहीं खेलने आतीं जहाँ प्यार बिखरा हो ,
जड़-चेतन के लिये मधुर सद्भाव जहाँ निखरा हो
धरती की सुन्दर रचना सम-भाव सभी को धारे
और शपथ लो यही कि इसमें माँ का रूप निहारें !




- प्रतिभा सक्सेना 










गुरुवार, 13 मई 2010

तन पुलकित मन प्रमुदित करती






Mother & child

रात्रि-दिवस के संधि-काल में अरुण ऊषा की अंगड़ाई सी
सरसिज की अलसित पलकों को किरण छुई मुस्काई सी


हरसिंगार के सुरभित सुमनों से सुवासित अंगनाई सी 
श्रांत क्लांत जीवन में भरती तव स्मृति तरुणाई सी 
तेरी छुवन हुआ करती माँ संजीवनी दवाई सी !



हठ करता जब, भर देती रूठे मन को मनुहारों से 
गले लगा कर नहला देती चुम्बन की बौछारों से 
आज नियति के डंक झेलता मैं कराहता रहता हूँ 
ओ ममतामयी कहाँ गई कातर पुकारता रहता हूँ 
लगता जैसे पास खड़ी माँ व्यथित-मना बौराई सी !



कथा कहानी में बीते पल दिन ढलते औ रातों में 
मौसम की मार न छू पाती जाड़ा गर्मी बरसातों में 
अब तो मौसम डसने लगते शिशिर शरीर कँपा जाता है 
आता निदाघ तन झुलसाता सावन भादों तरसाता है 
कोई कथा सुनाओ माँ झूमे मन-बगिया अमराई सी !



सावन के झूलों में कहता आओ माँ तुम भी बैठो 
वायुयान में अब उड़ता हूँ पास नहीं लेकिन तुम हो
ऐसी जाने कितनी सुधियाँ काल-पर्त में गडी हुई हैं 
अंतर्मन की कोर कोर में अंतर्ध्वनि सी अड़ी हुई हैं
मुखर दिव्य-वीणा के स्वर सी मंद गूँज शहनाई सी !



मंदिर चलते हुए राह में मुझे देखतीं जब थकता 
झट गोदी में उठा लिया करतीं जैसे छटाँक भर का 
जीवन के अंतिम पड़ाव पर थक कर चूर हुआ हूँ माँ
चिर-निद्रामय बोझिल पलकों से मजबूर हुआ हूँ माँ 
एक बार फिर गा दो ना माँ लोरी भूली बिसराई सी !


तन पुलकित मन प्रमुदित करती माँ की सुधियाँ पुरवाई सी !


सत्य नारायण शर्मा ‘ कमल’





शनिवार, 24 अप्रैल 2010

माँ ने मुझसे एक रोज़ कहा था

माँ ने मुझसे एक रोज़ कहा था




                 माँ ने मुझसे एक रोज़ कहा था,
                           करता चल सबसे राम-राम!
                 यश पाएगा दुनिया में तू,
                           राम  करेंगे तेरे सब  काम!!

                                          खुद केलिए सभी जीते हैं,
                                                 तू औरों के हित अब जीले!
                                                         अमृत चाहेगी यह दुनिया,
                                                                  तू दुनिया भर का विष पीले!!
                   जिस ने जग का विष पी डाला,
                            शंकर वही बना अभिराम!
                   माँ ने मुझसे एक रोज़ कहा था,
                             करता चल सबसे राम-राम!!

                                               स्वर्ग एक कल्पना ह्रदय की,
                                                     पा  सकता है अपने अन्दर!
                                                             जिस दिन जीतेगा तू खुद को,
                                                                       बन जाएगा पूर्ण  सिकंदर!!
                    मेरी गोद में है सब पगले!
                           जो तू  ढूंढें सुबहो-शाम!
                    यश पाएगा दुनिया में तू,
                               राम करेंगे तेरे  सब काम!!

                                                     ईश्वर को उसने ही पाया,
                                                             जिस ने मुझको देखा जग में! 
                                                                     माँ की उंगली पकड़ चला जो,
                                                                              कभी नहीं भटका वो मग में!!
                      चलना ही जीवन है पगले!
                              चल गंगा-जल सा अविराम!
                       यश पाएगा तू दुनिया में,
                               राम करेंगे तेरे सब काम!!
                                -------------------------


                                                  डा.योगेन्द्र नाथ शर्मा"अरुण",डी.लिट.
                                                   पूर्व प्राचार्य,
                                                    ७४/३, न्यू नेहरु नगर,रूडकी-247667
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शुक्रवार, 16 अप्रैल 2010

बाल भारती निबंध प्रतियोगिता पुरस्कार

प्रकाशन विभाग
सूचना और प्रसारण मंत्रालय
भारत सरकार
---
देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता पुरस्कार
बच्चों के लिए पुस्तक खेल है गणित का विमोचन

नई दिल्ली, शुक्रवार, 16 अप्रैल, 2010


देश भर के 13 स्कूली बच्चों को बाल भारती निबंध प्रतियोगिता-2009 के पुरस्कार दिए गए। प्रथम पुरस्कार के लिए दिल्ली की संस्कृति रावत, दूसरे पुरस्कार के लिए वर्धा, महाराष्ट्र के ओम कन्हैया बजाज और तीसरे पुरस्कार के लिए जोधपुर, राजस्थान की निधि शुक्ला के निबंध को चुना गया। इस मौके पर अन्य 10 को सांत्वना पुरस्कार भी दिए गए। तेरह विजेता बच्चों में से दस दिल्ली से बाहर के हैं। इनमें वर्धा, जोधपुर, नरसिंहपुर (म.प्र.), बड़वानी (म.प्र.), जयपुर, पौड़ी गढ़वाल (उत्तराखंड), सिरसा (हरियाणा), कानपुर (उ.प्र.), हैदराबाद (आ.प्र.), जमशेदपुर (झारखंड) जैसे दूर शहरों के प्रतियोगी शामिल हैं। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि तमन्ना फाउंडेशन की अध्यक्ष और शिक्षाविद श्रीमती श्यामा चोना ने विजेताओं को पुरस्कार बांटे।



वर्ष 2006 से हर वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित हो रही इस प्रतियोगिता में इस बार करीब एक हजार बच्चों ने भाग लिया। इस प्रतयोगता में टीवी कार्यक्रमों में बच्चों की भूमिका- उचित या अनुचित विषय पर देश भर के छात्रों ने अपने रचनात्मक निबंध भेजे। उनका मूल्यांकन चयन समिति ने किया।


इस मौके पर गणित जैसे विषय पर हिंदी में रोचक पुस्तकें लिखने वाले श्री आइवर यूशिएल की पुस्तक खेल है गणित का विमोचन भी किया गया। बाल मनोविज्ञान को समझते हुए बच्चों के लिए गणित को रोचक बनाने के तरीके इस पुस्तक में हैं। लेखक ने अनेक कठिन लगने वाले प्रश्नों के हल ढूंढने की तरकीबें भी पुस्तक में बताई हैं जो न केवल रोचक हैं बल्कि खेल-खेल में बच्चों के मन से गणित का डर दूर करती है।



पिछले 62 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रही बाल भारती सूचना और प्रसारण मंत्रालय के तहत प्रकाशन विभाग की एक उत्कृष्ट मासिक पत्रिका है। मनोरंजक और ज्ञानवर्धक होने के साथ ही यह बच्चों और किशोरों की प्रतिभा के विकास के लिए रचनात्मक अभियान भी चलाती रही है। वार्षिक निबंध और चित्रकला प्रतयोगिताएं और दूसरी गतिविधियां इसी अभियान का हिस्सा हैं जो बच्चों को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा देती हैं। इसमें पाठकों को सक्रिय रूप से शामिल करने की कोशिश लगातार जारी है। बदलते समय के साथ पत्रिका का कलेवर, प्रस्तुतीकरण बदला है। फिर भी पत्रिका की कीमत सिर्फ आठ रुपए है। संभवतः देश की सबसे पुरानी हिंदी की लोकप्रिय बाल पत्रिका बाल भारती की प्रसार संख्या डेढ़ लाख से ज्यादा है।




कार्यक्रम में अतिथियों का स्वागत प्रकाशन विभाग की अपर महानिदेशक श्रीमती वीना जैन ने किया। हर वर्ग और और भाषा-भाषी के लिए किफायती दरों पर पठनीय सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य के साथ प्रकाशन विभाग हर माह 13 भारतीय भाषाओं में राष्ट्रीय विकास को दर्शाती ‘योजना’ पत्रिका छापता है। इसके अलावा विभाग हिंदी और अंग्रेजी में ग्रामीण विकास की पत्रिका ‘कुरुक्षेत्र’, तथा हिंदी, और उर्दू में साहित्यिक पत्रिका ‘आजकल’ का प्रकाशन भी करता है।

शनिवार, 20 मार्च 2010

एक कविता आज गौरैया के नाम !


घरेलू गौरैया विलुप्तप्राय है |
20 मार्च 2010 को पहली बार विश्व गौरैया दिवस World Sparrow Day मनाया जा मनाया जा रहा है |

एक कविता आज गौरैया के नाम !


गौरैया 

बेचारी गौरैया एक
बैठ गई आ कर
खम्भों के बीच पसरे
बिजली के तारों पर
सोच रही कहाँ जाऊँ, क्या करुँ
कितना और ढूँढती फिरूँ 
चिंतातुर अनमनी
सारे घर मंझा आई
घोंसला का जुगाड़
कहीं नहीं बना पाई
घर अब कहाँ रहे
धन्नी बाँस मोखले वाले
दीवारें खड़ीं सपाट
लोप हो गये कब के आले
रहती वह नहीं पेड़ पर
कभी घोंसला बना कर
झरोखों मोखलों में बसती
तिनके घास फूस जुटा कर
फालतू कतरन झाड झंखाड़
जहाँ पाती चोंच में दबाती
फुर्र से उड़ जाती
घोंसले में खोंस आती
कीड़े मकोड़े अनाज-दाने
जो कुछ पाती चबा जाती
कुछ चोंच में दबाये
चिचिहाते बच्चों के
मुँह में ठूँस आती
कभी वह गौरैया
खिड़की की चौखट
अलगनी मुंडेरों पर
आँगन में चौबारों में
कबाड़ के ढेरों पर
सदियों से चहक रही थी
नाचती कूदती झगडती
पूरे घर में बहक रही थी
बच्चे किलकारी भरते
टकटकी लगा तकते
चिरैया का सर्कस देख
रोना भी भूल जाते
वक्त ने पलटा खाया
आधुनिक इमारतों का
अनोखा जाल बिछाया
उजड़ गई गौरैया की दुनिया
फैशन ने कहर ढाया
आदमी के स्वार्थ से हार कर
पहुँच गई विलुप्ति की कगार पर
हमारी घरेलू चिरैया
बेचारी गौरैया !
सत्यनारायण शर्मा कमल

मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

हिमपात : कैलिफ़ोर्निया में टाहो झील के किनारे

एक बालगीत

हिमपात 
कैलिफ़ोर्निया में टाहो झील के किनारे

शकुन्तला बहादुर





http://thestormking.com/tahoe_nuggets/Nugget_172/Nugget__172_A_April_23_Snowfall.jpg



ऊँचे पर्वत पर हम आए ।
मन में हैं खुशियाँ भर लाए।।

पाइन के हैं वृक्ष बड़े ।
सीधे हैं प्रहरी से खड़े।।

देखो झरती कैसे झर झऱ।
गिरती जाती बर्फ़ निरन्तर।।

बरस रही है सभी तरफ़।
दुग्ध-धवल सी दिखे बरफ़।।

आज हुआ कैसा हिमपात।
ढक गइ धरा, ढके तरुपात।।

ऐसा लगे शीत के भय से।
सूरज भी न निकला घर से।।

बादल की वह ओढ़ रज़ाई।
बिस्तर में छिप लेटा भाई।।

हैं मकान सब ढके बर्फ़ से।
बन्द रास्ते हुए बर्फ़ से ।।

देखो बाहर ज़रा निकलकर ।
चलो बर्फ़ में सँभल सँभल कर।।

बरफ़ थपेड़े दे गालों पर।
जूतों में गल जाए पिघलकर।।

ऊँचे कोमल बर्फ़ के गद्दे।
बिछे हुए हैं इस भू पर।।

मन करता है उन पर लोटें।
बच्चों के संग हिलमिल कर।।

बर्फ़ के लड्डू बना बना कर।
बालक खेलें खुश हो हो कर।।

मारें इक दूजे को हँस कर।
फिर भागें किलकारी भर कर।।

और कभी मन होता ऐसा।
बचपन में देखा था जैसा।।

बर्फ़ का चूरा हाथ में लेकर।
उस पर शर्बत लाल डाल कर।।

चुस्की लेकर उसको खाएँ।
घिसी बरफ़ का लुत्फ़ उठाएँ।।

दृश्य मनोरम बड़ा यहाँ है।
अपना मन खो गया यहाँ है।।

** ** ** **

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

रोमांचकारी `मास्टरपीस' by ए. आर. रहमान


रोमांचकारी `मास्टरपीस' by ए. आर. रहमान



ए. आर. रहमान द्वारा निर्मित इस रोमांचकारी `मास्टरपीस' को देखना सुनना आप को रुला सकता है, भावविह्वल कर सकता है| भारत के सभी श्रेष्ठ गायक और वादक स्वयं इसमें सम्मिलित हैं और शब्द हैं कवीन्द्र रवीन्द्र के |









राष्‍ट्र–गान जन-गण-मन गाने के लिए नियम        
साभार : हिन्दी मीडिया


भारत का राष्‍ट्र गान अनेक अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। राष्‍ट्र गान के सही संस्‍करण के बारे में समय समय पर अनुदेश जारी किए गए हैं, इनमें वे अवसर जिन पर इसे बजाया या गाया जाना चाहिए और इन अवसरों पर उचित गौरव का पालन करने के लिए राष्‍ट्र गान को सम्‍मान देने की आवश्‍यकता के बारे में बताया जाता है। सामान्‍य सूचना और मार्गदर्शन के लिए इस सूचना पत्र में इन अनुदेशों का सारांश निहित किया गया है।


उपरोक्‍त राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण है और इसकी कुल अवधि लगभग 52 सेकंड है।

राष्‍ट्र गान की पहली और अंतिम पंक्तियों के साथ एक संक्षिप्‍त संस्‍करण भी कुछ विशिष्‍ट अवसरों पर बजाया जाता है। इसे इस प्रकार पढ़ा जाता है:


जन-गण-मन अधिनायक, जय हे
भारत-भाग्‍य-विधाता,
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे।

 

संक्षिप्‍त संस्‍करण को चलाने की अवधि लगभग 20 सेकंड है।

जिन अवसरों पर इसका पूर्ण संस्‍करण या संक्षिप्‍त संस्‍करण चलाया जाए, उनकी जानकारी इन अनुदेशों में उपयुक्‍त स्‍थानों पर दी गई है।





राष्‍ट्र गान बजाना



1.    राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर बजाया जाएगा:



i.    नागरिक और सैन्‍य अधिष्‍ठापन



ii.    जब राष्‍ट्र सलामी देता है (अर्थात इसका अर्थ है राष्‍ट्रपति या संबंधित राज्‍यों/संघ राज्‍य क्षेत्रों के अंदर राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर को विशेष अवसरों पर राष्‍ट्र गान के साथ राष्‍ट्रीय सलामी - सलामी शस्‍त्र प्रस्‍तुत किया जाता है);



iii.    परेड के दौरान - चाहे उपरोक्‍त (ii) में संदर्भित विशिष्‍ट अतिथि उपस्थित हों या नहीं;



iv.    औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सरकार द्वारा आयोजित अन्‍य कार्यक्रमों में राष्‍ट्रपति के आगमन पर और सामूहिक कार्यक्रमों में तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के अवसर पर ;



v.    ऑल इंडिया रेडियो पर राष्‍ट्रपति के राष्‍ट्र को संबोधन से तत्‍काल पूर्व और उसके पश्‍चात;



vi.    राज्‍यपाल/लेफ्टिनेंट गवर्नर के उनके राज्‍य/संघ राज्‍य के अंदर औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों में आगमन पर तथा इन कार्यक्रमों से उनके वापस जाने के समय;



vii.    जब राष्‍ट्रीय ध्‍वज को परेड में लाया जाए;



viii.    जब रेजीमेंट के रंग प्रस्‍तुत किए जाते हैं;



ix.    नौ सेना के रंगों को फहराने के लिए।



2.    राष्‍ट्र गान का संक्षिप्‍त संस्‍करण मेस में सलामती की शुभकामना देते समय बजाया जाएगा।



3.    राष्‍ट्र गान उन अन्‍य अवसरों पर बजाया जाएगा जिनके लिए भारत सरकार द्वारा विशेष आदेश जारी किए गए हैं।



4.    आम तौर पर राष्‍ट्र गान प्रधानमंत्री के लिए नहीं बजाया जाएगा जबकि ऐसा विशेष अवसर हो सकते हैं जब इसे बजाया जाए।



5.    जब राष्‍ट्र गान एक बैंड द्वारा बजाया जाता है तो राष्‍ट्र गान के पहले श्रोताओं की सहायता हेतु ड्रमों का एक क्रम बजाया जाएगा ताकि वे जान सकें कि अब राष्‍ट्र गान आरंभ होने वाला है। अन्‍यथा इसके कुछ विशेष संकेत होने चाहिए कि अब राष्‍ट्र गान को बजाना आरंभ होने वाला है। उदाहरण के लिए जब राष्‍ट्र गान बजाने से पहले एक विशेष प्रकार की धूमधाम की ध्‍वनि निकाली जाए या जब राष्‍ट्र गान के साथ सलामती की शुभकामनाएं भेजी जाएं या जब राष्‍ट्र गान गार्ड ऑफ ओनर द्वारा दी जाने वाली राष्‍ट्रीय सलामी का भाग हो। मार्चिंग ड्रिल के संदर्भ में रोल की अवधि धीमे मार्च में सात कदम होगी। यह रोल धीरे से आरंभ होगा, ध्‍वनि के तेज स्‍तर तक जितना अधिक संभव हो ऊंचा उठेगा और तब धीरे से मूल कोमलता तक कम हो जाएगा, किन्‍तु सातवीं बीट तक सुनाई देने योग्‍य बना रहेगा। तब राष्‍ट्र गान आरंभ करने से पहले एक बीट का विश्राम लिया जाएगा।





राष्‍ट्र गान को सामूहिक रूप से गाना



1.    राष्‍ट्र गान का पूर्ण संस्‍करण निम्‍नलिखित अवसरों पर सामूहिक गान के साथ बजाया जाएगा:



i.    राष्‍ट्रीय ध्‍वज को फहराने के अवसर पर, सांस्‍कृतिक अवसरों पर या परेड के अलावा अन्‍य समारोह पूर्ण कार्यक्रमों में। (इसकी व्‍यवस्‍था एक कॉयर या पर्याप्‍त आकार के, उपयुक्‍त रूप से स्‍थापित तरीके से की जा सकती है, जिसे बैंड आदि के साथ इसके गाने का समन्‍वय करने के लिए प्रशिक्षित किया जाएगा। इसमें पर्याप्‍त सार्वजनिक श्रव्‍य प्रणाली होगी ताकि कॉयर के साथ मिलकर विभिन्‍न अवसरों पर जनसमूह गा सके);



ii.    सरकारी या सार्वजनिक कार्यक्रम में राष्‍ट्रपति के आगमन के अवसर पर (परंतु औपचारिक राज्‍य कार्यक्रमों और सामूहिक कार्यक्रमों के अलावा) और इन कार्यक्रमों से उनके विदा होने के तत्‍काल पहले।



2.    राष्‍ट्र गान को गाने के सभी अवसरों पर सामूहिक गान के साथ इसके पूर्ण संस्‍करण का उच्‍चारण किया जाएगा।



3.    राष्‍ट्र गान उन अवसरों पर गाया जाए, जो पूरी तरह से समारोह के रूप में न हो, तथापि इनका कुछ महत्‍व हो, जिसमें मंत्रियों आदि की उपस्थिति शामिल है। इन अवसरों पर राष्‍ट्र गान को गाने के साथ (संगीत वाद्यों के साथ या इनके बिना) सामूहिक रूप से गायन वांछित होता है।



4.    यह संभव नहीं है कि अवसरों की कोई एक सूची दी जाए, जिन अवसरों पर राष्‍ट्र गान को गाना (बजाने से अलग) गाने की अनुमति दी जा सकती है। परन्‍तु सामूहिक गान के साथ राष्‍ट्र गान को गाने पर तब तक कोई आपत्ति नहीं है जब तक इसे मातृ भूमि को सलामी देते हुए आदर के साथ गाया जाए और इसकी उचित ग‍रिमा को बनाए रखा जाए।



5.    विद्यालयों में, दिन के कार्यों में राष्‍ट्र गान को सामूहिक रूप से गा कर आरंभ किया जा सकता है। विद्यालय के प्राधिकारियों को राष्‍ट्र गान के गायन को लोकप्रिय बनाने के लिए अपने कार्यक्रमों में पर्याप्‍त प्रावधान करने चाहिए तथा उन्‍हें छात्रों के बीच राष्‍ट्रीय ध्‍वज के प्रति सम्‍मान की भावना को प्रोत्‍साहन देना चाहिए।






सामान्‍य



1.    जब राष्‍ट्र गान गाया या बजाया जाता है तो श्रोताओं को सावधान की मुद्रा में खड़े रहना चाहिए। यद्यपि जब किसी चल चित्र के भाग के रूप में राष्‍ट्र गान को किसी समाचार की गतिविधि या संक्षिप्‍त चलचित्र के दौरान बजाया जाए तो श्रोताओं से अपेक्षित नहीं है कि वे खड़े हो जाएं, क्‍योंकि उनके खड़े होने से फिल्‍म के प्रदर्शन में बाधा आएगी और एक असंतुलन और भ्रम पैदा होगा तथा राष्‍ट्र गान की गरिमा में वृद्धि नहीं होगी।



2.    जैसा कि राष्‍ट्र ध्‍वज को फहराने के मामले में होता है, यह लोगों की अच्‍छी भावना के लिए छोड दिया गया है कि वे राष्‍ट्र गान को गाते या बजाते समय किसी अनुचित गतिविधि में संलग्‍न नहीं हों।












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